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सोशल साइट्स कितनी सही कितनी गलत ?

आज सोशल नेट्वर्किंग पूरी दुनिया को जिस तरह एक दूसरे के नज़दीक ला दिया है। यह  की तरह प्रतीत  हम भारत में बैठकर  अमेरिकी से  तरह बात कर रहे है जैसे वो हमारे सामने मौजूद हो। पर इस सोशल साइड्स ने जितना एक – दूसरे को करीब लाया है उतना ही ज़्यादा परेशानी का कारण भी बनाया है। 

वॉट्सएप्प , फेसबुक एवं अन्य कोई सोशल साइड्स इसने हर वर्ग के व्यक्ति को इतना पागल बना दिया है की दिन रात सभी गर्दन झुकाये टकटकी बांधकर अपने मोबाइल में घुसे रहते है न खाने की चिंता न और किसी काम का होश  मोबाइल या लैपटॉप पास होना चाहिए। पर इस आदत के चलते कई बीमारी बीमारी और परेशानी भविष्य में बहुत नुक्सान देती है। 
 
अमेरिका में स्थित इंटेल सेक्योरिटी ग्रुप ने अभी हाल ही में टीन्स ,ट्विन्स एवं टेक्नोलॉजी नाम से सर्वे करवाये है। जिसके अंतर्गत 50 %  बच्चे  बिना कुछ समझे अनजान व्यक्तियों से करना व उनपर भरोसा  हैं। गौरतलब है की यह सर्वे राजधानी दिल्ली समेत देश के अन्ये राज्यों से लिए गए है। इस सर्वे में सोशल नेटवर्किंग साइड्स पर 8 से 16 साल के बच्चों के व्यवहारों का अध्ययन किया गया इस दौरान बच्चों के माता पिता के भी चिंताओं के बारे मैं अधिययन किया गया। इस अध्ययन से जुड़े 44 % बच्चों ने कहा की वह जिन लोगों से पहली बार  हैं।  उनसे वे व्यक्तिगत रूप से मिल चुके हैं या मिल सकते हैं। 
 
इस अध्ययन से ये पता चला है की बच्चों तथा अभिभावकों के बीच बेहतर संवाद होना ज़रूरी है इसके आलावा बच्चों को इंटरनेट सम्बन्धी  सुरक्षा के बारे मैं में जागरूक बनाया जाना भी ज़रूरी है। सर्वे के दौरान ये बात भी सामने आई है की 17 % माता पिता ये पता लगाने मैं दिलचस्पी रखते हैं की उनके बच्चे इंटरनेट पर किसी अनजान व्यक्ति से तो बात नहीं कर रहे। माता – पिता हमेशा अपने बच्चों के लिए चिंतित  पर बच्चे सतर्कता नहीं बरतते और किसी बड़ी मुसीबत में उलझ जाते है।  
 
जाने – माने मनोचिकित्सक  का कहना है की “सोशल  साइडस अनजान लोगों के संपर्क में आने से बच्चे साजिश का शिकार हो जाते है या किसी और आपराधिक कार्यों में लिप्त हो जाते है। ऐसी ख़बरें आय दिन सुनने में आती  रहती हैं “
 
ये पूरी तरह बच्चों की जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। बच्चों का इन साइड्स को इस्तेमाल करने के कारण वह पढ़ाई  पर ध्यान नहीं दे पाते फलस्वरूप उनके परीक्षा का परिणाम संतोषजनक पाता। बच्चों की रचनात्मक कौशल लेखन की समाप्ति हो जाती है। क्योंकि इसमें शब्दों को विस्तृत रूप में  न लिखकर संक्षिप्त रूप में लिखा जाता है। ये बच्चों को पश्चिम संस्कृति की और अग्रसर कर भारतीय मूल्यों का ह्रास कर रहा है ऐसे मैं ज़रूरी है की माता – पिता अपने बच्चों को अभी से ही सही मार्गदर्शन दें।   
 
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