मुफ्तखोरी vs हरामखोरी|

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क्या दिल्ली की जनता मुफ्तखोर है ? दिल्ली विधान सभा में आम आदमी पार्टी की बम्बर जीत के बाद सोशल मीडिया से लेकर आम जन में बीजेपी और मोदी समर्थक यह भी कहने लगे है |मुफ्तखोरी के इस आरोप का जवाब हरामखोरी शब्द से दिया जा रहा है –दिल्ली में हरामखोरी और मुफ्तखोरी पर बहस चल निकली है |क्या है यह बहस और क्या है दोनों के तथ्य और तर्क इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे |और इस पर आपकी क्या राय है हमें कमेंट बॉक्स में लिखें या व्हाट्स ऐप करें |दोस्तों , दिल्ली विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 62 सीटें जीतकर फिर से इतिहास बना दिया |इसमें बीजेपी को फिर से करारी शिकस्त मिली और वो केवल 8 सीटों पर ही सिमट कर रह गई |कांग्रेस का तो खाता तक नहीं खुला |इस चुनाव को बेशक राष्ट्रवाद ,भारत पाकिस्तान और शाहिब बाग़ का केंद्र बना दिया गया हो , लेकिन आदमी आदमी पार्टी की इस शानदार जीत को विरोधी दल फ्री के फार्मूले की जीत बता रहे है |यह अलग बात है की विपक्ष के बड़े नेता  और समर्थक खुलकर इस पर बहस नहीं कर रहे है ,मीडिया में कोइ बयान  नहीं दे रहे है।  लेकिन आम चर्चाओं और सोशल मीडिया में खुलकर  दिल्ली की जनता को मुफ्तखोर तक बता रहे है |दिल्ली में “आप ” सरकार और इसके पक्षधर कह रहे है की केजरीवाल के इस  वेलफेयर स्टेट मॉडल ने देशभर में अन्य राज्य सरकारों पर भी ऐसी राजनीती का दबाव बना दिया है |इस मॉडल में दिल्ली सरकार दिल्ली वालों को 200 यूनिट बिजली फ्री , 400 यूनिट पानी फ्री ,महिलाओ के लिए बस यात्रा फ्री , इलाज फ्री , श्रवण कुमार तीर्थ योजना में बुजुर्गों के लिए तीर्थ यात्रा फ्री , भीम योजना में दलित वर्ग को कोचिंग फ्री , इस तरह योजनाओं में दिल्ली सरकार ने दिल खोलकर खर्च किया. इसका नतीजा ये रहा कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम जनता ने ज़बरदस्त समर्थन दिया।  “दिल्ली की जनता को मुफ़्ख़ोर कहा गया तो इसका जबाब सोशल मीडिया के जरिये सामने भी आ रहा है। जबाब में कहा जा रहा है की बीजेपी ने भी अपने घोषणा पत्र में ऐसे ही मुफ्त की योजनाओं का जमकर प्रचार किया। मनोज तिवारी कहते रहे कि यदि बीजेपी की सरकार आयी तो वे दिल्ली सरकार से ज्यादा इस तरह के काम करेंगे। कांग्रेस ने भी अपने घोषणा पत्र में हर महीने 5000 पेंशन , फ्री बिजली पानी जैसी घोषणएं कर दिल्ली की जनता को लुभाने की कोशिस की। लेकिन जब दिल्ली की जनता ने भारत पाकिस्तान , शाहिब बाग़ जैसे मुद्दों को नकार दिया तो वह मुफ्तखोर हो गयी। ये कैसा तर्क है। देशभर में राज्य और केंद्र सरकार जनता को सब्सिड़ी देकर  कई कल्याणकारी योजनाएं चलाती है। दिल्ली सरकार बिजली ,पानी और महिलाओं की फ्री बस सेवा के तहत सालाना 11 करोड़ रुपयों से ज्यादा सब्सिड़ी देकर समाज सेवा कर रही है।  अब हम बात करते है मुफ़्ख़ोरी के इस आरोप के जबाब की जो लोग दिल्ली की जनता को मुफ़्ख़ोर कह रहे है उन्हें भी आईना दिखाकर कहा जा रहा है की मुफ्तखोर हराम खोर से तो अच्छा है। इसके पीछे जो तर्क दिए जा रहे है उन्हें भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। विपक्ष केंद्र सरकार पर आरोप लगाता रहा है की वह कॉर्पोरेट घरानों के कर्ज़े माफ़ कर रही है। केंद्र की मोदी सरकार ने 6 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ किया है।  इनमें किसानों का ही महज 4300 करोड़ रुपए क़र्ज़ माफ़ किया गया है। देश के पूंजीपतियों के क़र्ज़ माफ़ हो तो ही, लेकिन आम लोगों को हज़ार दो हज़ार करोड़ रूपया सब्सिड़ी देकर जनता का भला करे तो मुफ्त खोरी ये कैसा इन्साफ है।  कितने ही नीरव मोदी और माल्या जैसे लोग हज़ारों लाखों करोड़ रुपया लेकर देश से भाग गए।  बैंकों में एनपीए बढ़ रहा है।  पूंजीपति लोन लेकर मौज कर रहे है। देशभर में सरकार चलाने वाले सांसद , नेता , मंत्री , ढाई लाख करोड़ रुपयों से ज्यादा की मुफ्त सुविधाएं ले रहे है , लेकि इसके बदले कर क्या रहे है ये सबके सामने है। इस हरामखोरी से अच्छी तो मुफ्तखोरी है। स्वास्थ्य सेवाएं , शिक्षा , और समाज समानता और कल्याण के लिए किये गए खर्च को मुफ़्ख़ोरी कहना न्याय नहीं है।  बहरहाल मुफ्तखोरी बनाम हराम खोरी पर बहस जारी है।  आप इस पर क्या सोचते है कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें। व्हाट्सअप के जरिये अपने विचार टेक्स्ट या वीडियो के रूप में भेजें |हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा |

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