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घर-घर धर्मध्वजा फहराएं , 2 अप्रैल को मंदिरों में धूमधाम से हिन्दू नव वर्ष मनायें : करनैल सिंह

राजेंद्र स्वामी , दिल्ली दर्पण ब्यूरो
दिल्ली। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार इस बार हिन्दू नव वर्ष 2 अप्रैल को है। दिल्ली बीजेपी के मंदिर प्रकोष्ठ ने इस वर्ष चैत्र प्रतिपदा नव संवत्सर 2079 यानी हिन्दू नव वर्ष दिल्ली के सभी मंदिरों में धूम धाम से मनाने की तैयारी  की है।
दिल्ली बीजेपी के मंदिर प्रकोष्ठ संयोजक करनैल सिंह दिल्ली के सभी मंदिरों में मीटिंग कर रहे है, साथ ही सभी से यह अपील कर रहे है कि  वे अपने सनातन धर्म की शक्ति को जाने और विदेशी नव वर्ष का बहिष्कार कर हिन्दू नव वर्ष धूमधाम से मनायें। दिल्ली बीजेपी ने मंदिरों के सभी पुजारियों और प्रबंधकों से भी अपील की है कि वे एक अप्रैल को मंदिरों को अच्छे से सजाएं और 2 अप्रैल को नव वर्ष धूमधाम से मनाएं।


दिल्ली बीजेपी मंदिर प्रकोष्ठ का प्रयास है कि  सनातन धर्म के कैलेंडर के अनुसार हिन्दू नव वर्ष के महत्व को देश की युवा पीढ़ी भी अच्छे से समझे और उसे धूम धाम से मनाये। मंदिर प्रकोष्ठ संयोजक करनैल सिंह का मानना है कि आज का युवा जिस तर्क और तरीके से प्रभावित है उसे उसी अनुसार समझने की जरूरत है। यदि आज का युवा सनातन धर्म की वैज्ञानिकता को समझ गया तो देश को विश्व गुरु बनाने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए वह  मंदिरों की बैठकों  में इस पर ख़ास जोर दे रहे है कि मंदिरों में नए साल के मौके पर युवकों और बच्चों के मनोरंजन के लिए क्या ख़ास इंतजाम हो।
करनैल सिंह ने कहा कि  हिन्दू नव वर्ष और अंग्रेजी नव वर्ष के बीच भेद बताने की जरूरत है। यह काम हमारे मंदिरों के पुजारी और संत अच्छी  तरह से कर सकते हैं । वे युवाओं से पूछे कि  इस विदेशी नव वर्ष पर कैसा हर्ष ? क्या ख़ास है इस विदेशी नव वर्ष में ? उन्होंने कहा कि आदि काल से पूरी दुनिया में नव वर्ष मार्च के अंतिम सप्ताह और अप्रैल के शुरू में मनाया जाता रहा है। लेकिन रोम के शासकों ने नयी गणना कर अपने देवता जैनुस के नाम पर नए साल का पहला महीना जनवरी कर दिया। इसी को रोमन कैलेंडर यानी अंग्रेजी साल कहतें है। अंग्रेजी कैलेंडर का  कुछ खगोलीय महत्त्व था तो कुछ उनके अपने देवीय महत्त्व ,लेकिन तर्क और वैज्ञानिकता की कसौटी पर कसने के बाद अंग्रेजी नए साल पर भ्रम  बना तो नए साल को लेकर कई बदलाव भी होते  रहे।
करनैल सिंह ने कहा कि सन 1752  में भारत पर भी अंग्रेजों का राज था इसलिए उस  समय की ब्रितानी  हुकूमत ने  आधिकारिक तौर  इस अंग्रेजी कैलेंडर को अपना लिया। इस सबके बावजूद भारत  के हर सूबे के लोग अपनी मान्यताओं के  अपना नया साल मनाते थे। मराठी में गुड़ी पड़वा तो गुजराती दिवाली को नया साल मानते है। विक्रम संवत की शुरुआत सम्राट विक्रमादित्य ने 57  ईसा  पूर्व को की थी। विक्रम संवंत् सबसे अधिक प्रासंगिक, सार्वभौमिक, सर्वमान्य और वैज्ञानिक कैलेंडर है। यह सौर और चंद्रमा की गणना पर आधारित है। हिंदू पंचांग की गणना के आधार पर यह हजारों साल पहले बता दिया था कि अमुक दिन,अमुक समय पर सूर्यग्रहण होगा। युगों बाद भी यह गणना सही और सटीक साबित हो रही है। ज्योतिष की गणना के अनुसार देश ,राज्य के समस्त विषयों की भविष्यवाणी ,लोक व्यवहार , संस्कार और धार्मिक अनुष्ठान की तिथियां इसी कैलेंडर में निर्धारित की जाती है।

उन्होंने कहा कि अंग्रेजी कैलेंडर की तुलना में हिन्दू कैलेंडर कहीं अधिक तार्किक ,वैज्ञानिक है। यह नई फसल का समय होता है।  यह प्रकृति ,परमात्मा के नजदीक है। शीत ऋतु  के बाद पतझड़ आरम्भ होता है और फिर पेड़ों पर नए कोमल पत्ते आतें है। हर तरफ हरियाली छा जाती है कोयल की कूक सुनायी देती है यानी बसंत ऋतु की शुरुआत हो जाती है। यही वह समय होता है जब प्रकृति नयी ऊर्जा के साथ नयी करवट लेती है।
हिन्दू नव वर्ष का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्त्व भी है। हिन्दू नव वर्ष के दिन श्रीकृष्ण जी का विभूति स्वरूप बसंत ऋतु का दिन है। इस दिन भगवान श्रीराम ने बाली का वध किया था। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन अयोध्या में श्रीराम का विजयोत्सव मनाने के लिए अयोध्या वासियों ने घर-घर के द्वार पर धर्मध्वजा  को फहराया था। इसलिए इस दिन धर्मध्वजा फहराया जाता है ,महाराष्ट्र में इसे गुड़ी कहते है। यह ब्रह्माण्ड के निर्माण का भी दिन है। इस दिन ब्रह्मदेव ने सृष्टि की रचना की थी,इसलिए सृष्टि को ब्रह्माण्ड भी कहा जाता है। नवरात्रि  भी इसी तिथि से आरंभ होते  हैं ।

करनैल सिंह ने कहा कि जब हमारे समस्त त्योहार इसी कैलेंडर से निर्धारित होते है , वित्तीय वर्ष भी इसी कैलेंडर से शुरू होता है ,शैक्षणिक सत्र भी इसी के बाद से शुरू होता है तो फिर केवल नया साल अंग्रेजी क्यों ? यह न केवल हमारी सांस्कृतिक दासता का प्रतीक है बल्कि हमारे समाज ,हमारे राष्ट्र के चहुमुखी विकास की सबसे बड़ी बाधा है। हमें इस गुलामी से भी आज़ाद होना है और भारत को फिर से विश्व गुरु बनाना है। इसी संकल्प के साथ हम 2 अप्रैल को नया साल मनाएं –मंदिरों में ही नहीं, घर घर पर धर्मध्वजा लहराएं और दुनिया को यह बताएं कि हिन्दू जाग चुका है। 

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