नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया रैली को लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) ने गंभीर आरोप लगाए हैं। दिल्ली सरकार के मंत्री और वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने दावा किया है कि केंद्र सरकार ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारियों को जबरदस्ती रैली में भेजा। उनका कहना है कि इस कार्यक्रम को सफल दिखाने के लिए कर्मचारियों पर दबाव बनाया गया, जिससे यह रैली “जन समर्थन की बजाय जबरन जुटाई भीड़” जैसी प्रतीत हुई।
भारद्वाज का आरोप
सौरभ भारद्वाज ने प्रेस वार्ता के दौरान कहा, “प्रधानमंत्री की लोकप्रियता घट चुकी है। अब उनकी रैलियों में जनता स्वेच्छा से नहीं आती। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने विभिन्न विभागों के कर्मचारियों को बुलाने का आदेश दिया और कई जगहों से रिपोर्ट मिल रही है कि कर्मचारियों को धमकाकर रैली में पहुंचने के लिए मजबूर किया गया।”
उन्होंने आगे कहा कि लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में लोगों की भागीदारी स्वेच्छा से होनी चाहिए, लेकिन सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करके कर्मचारियों को भेजना लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना है।
विपक्ष का हमला
AAP नेता ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से परेशान है। इन मुद्दों पर सरकार जवाब देने के बजाय प्रचार-प्रसार में लगी हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि पीएम मोदी की रैलियों को भव्य और भीड़भाड़ वाला दिखाने के लिए केंद्र सरकार प्रशासनिक तंत्र का उपयोग करती है।
भारद्वाज ने सवाल उठाया कि यदि प्रधानमंत्री मोदी वास्तव में लोकप्रिय हैं तो उन्हें इस तरह की “भीड़ प्रबंधन रणनीति” की ज़रूरत क्यों पड़ रही है?
बीजेपी का पलटवार
वहीं, बीजेपी की ओर से AAP के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया गया। पार्टी नेताओं ने कहा कि प्रधानमंत्री की रैलियों में देशभर से लाखों लोग स्वेच्छा से शामिल होते हैं और उनके कार्यक्रमों की लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि AAP नेताओं को पीएम मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से चिढ़ है, इसलिए वे ऐसे बेबुनियाद बयान देकर सुर्खियां बटोरना चाहते हैं।
राजनीतिक माहौल गरमाया
AAP और बीजेपी के बीच यह विवाद आने वाले चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल को और गरमा सकता है। एक ओर जहां विपक्ष रैली में जबरन कर्मचारियों को लाने का मुद्दा उठाकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं बीजेपी इसे विपक्ष की “हताशा” बता रही है।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री की रैली पर लगे ये आरोप राजनीतिक बहस को नया मोड़ देते हैं। सवाल यह है कि क्या सचमुच सरकारी कर्मचारियों को जबरन बुलाया गया था या यह विपक्ष का सिर्फ एक राजनीतिक हमला है? इसका जवाब तो जांच और तथ्यों से ही सामने आएगा, लेकिन इतना तय है कि इस विवाद ने सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्ष के बीच टकराव को और तेज़ कर दिया है।

