सोचिए… आप अपने परिवार के साथ मंदिर से लौट रहे हैं। पूजा खत्म हो चुकी है, माहौल में भक्ति की शांति है, बच्चे खिलखिलाते हुए घर की ओर भाग रहे हैं। और तभी… एक पल में सब खत्म हो जाता है।
इसी तरह की घटना हुई उस पांच साल की बच्ची के साथ, जो मंदिर से लौटते हुए अपनी मासूम हंसी और नन्हें सपनों के साथ हमेशा के लिए इस दुनिया को छोड़ गई। उसके सिर में रास्ते में निकला हुआ लोहे का सरिया घुस गया—इतना गहरा कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं मिला।
अचानक से टूटा परिवार का सपना
वो बच्ची अभी तो जिंदगी जीना शुरू ही कर रही थी। गुड़ियों से खेलना, नई चीजों को जानने की जिज्ञासा, मां की गोद में सिमटकर सो जाना—यही उसकी दुनिया थी। लेकिन उस दिन मंदिर से लौटते वक्त जो हुआ, उसने पूरे परिवार की दुनिया छीन ली।
पिता की आंखों में जो चमक बेटी की मुस्कान से आती थी, अब हमेशा के लिए बुझ गई। मां के हाथों में जो नन्ही उंगलियां थीं, वो अचानक छूट गईं। परिवार की खुशियों का सूरज पल भर में डूब गया।
हादसा या किसी की बेरुखी?
यह सवाल अब हर किसी के मन में है—क्या यह सिर्फ एक हादसा था, या फिर किसी की लापरवाही ने एक मासूम जान ले ली?
आखिर उस जगह पर लोहे का सरिया खुला क्यों पड़ा था? क्या वहां काम चल रहा था और उसे सही से ढका नहीं गया था? या फिर किसी ने जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही कर दी?
हकीकत यही है कि सार्वजनिक जगहों पर ऐसी खतरनाक चीजें बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। वहां तो बच्चे, बुजुर्ग, और रोज़मर्रा के लोग गुज़रते हैं। एक छोटी-सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है—और इस बच्ची के साथ वही हुआ।
चंद दिनों का शोर, उम्रभर का दर्द
इस परिवार के लिए यह हादसा सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि जिंदगी भर का जख्म है। मां की चीखें, पिता की खामोशी और रिश्तेदारों की बेबसी किसी भी दिल को पिघला सकती है।
पर दुख की बात यह है कि समाज इन घटनाओं को जल्दी भूल जाता है। कुछ दिन मीडिया में शोर होता है, लोग सोशल मीडिया पर संवेदनाएं जताते हैं, फिर सब चुप हो जाते हैं। लेकिन उस परिवार की ज़िंदगी कभी पहले जैसी नहीं होती।
जिम्मेदार कौन?
क्या स्थानीय प्रशासन जागेगा? क्या नगर निगम या निर्माण कार्य करने वाली कंपनी जवाबदेह बनेगी?
हर सार्वजनिक जगह पर सुरक्षा इंतजाम होना चाहिए। खुले सरिए, गड्ढे, टूटे तार या अधूरे काम लोगों के लिए खतरा हैं। इनको समय रहते ठीक करना जिम्मेदारों का काम है। लेकिन जब तक नियम सिर्फ कागज पर रहेंगे, तब तक ऐसी मासूम जिंदगियां यूं ही बर्बाद होती रहेंगी।
सबक जो हमें लेना चाहिए
इस घटना से हमें एक सबक लेना होगा—लापरवाही किसी की जिंदगी छीन सकती है। शायद उस दिन अगर सुरक्षा इंतजाम होते, तो पांच साल की बच्ची आज भी अपने घर में खेल रही होती।
- क्या जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई होगी?
- क्या हम सब मिलकर सार्वजनिक जगहों पर लापरवाही को बर्दाश्त करना बंद करेंगे?
- या यह भी एक खबर बनकर कुछ दिन में भुला दी जाएगी?
निष्कर्ष
यह बच्ची सिर्फ पांच साल की थी, लेकिन उसकी मौत हम सबको एक बड़ा आईना दिखा गई है। यह हादसा हमें झकझोरता है और पूछता है—क्या हमारी जिंदगियां इतनी सस्ती हैं?उस नन्हीं परी की कहानी सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। हमें तय करना होगा कि हम इस दर्दनाक हादसे को एक सीख बनाएं, ताकि कल कोई और मां-बाप अपनी संतान को यूं ना खोएं।

