दिल्ली पुलिस ने आखिरकार 23 साल से फरार चल रहे उस डबल मर्डर केस की गुत्थी सुलझा दी है, जो दो दशकों से पीड़ित परिवारों के दिलों में एक न भरने वाला दर्द बनकर मौजूद था। इस लंबे इंतज़ार के बाद आरोपियों की गिरफ्तारी ने उन लोगों को पहली बार यह उम्मीद दी है कि न्याय चाहे देर से मिले, लेकिन मिलता जरूर है।
यह घटना साल 2001 की है—एक ऐसी रात की, जिसे कई लोगों ने अपनी आंखों के सामने खून-खराबे में बदलते देखा था। दो लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी और मामले ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी थी। घटना के बाद मुख्य आरोपी और उसका साथी फरार हो गए। शुरुआती दिनों में पुलिस ने कई छापेमारियां कीं, लेकिन दोनों आरोपी एक जगह टिककर न रहते और बार-बार पहचान बदलकर अलग-अलग राज्यों में छिपते रहे। धीरे-धीरे मामला फाइलों में दबता गया, लेकिन पीड़ित परिवारों की उम्मीद कभी नहीं टूटी।
इसी उम्मीद ने पुलिस को भी मजबूर किया कि इस केस को बंद न होने दिया जाए। हाल ही में दिल्ली पुलिस की एक विशेष टीम ने इस फाइल को फिर से खोला। टीम ने पुराने सुबूतों से लेकर आधुनिक तकनीक तक—हर संभव साधन का इस्तेमाल किया। फोन कॉल रिकॉर्ड, बैंक मूवमेंट, सोशल मीडिया गतिविधि और मुखबिरों से मिली छोटी-छोटी जानकारियों को जोड़ते-जोड़ते पुलिस को आखिरकार एक महत्वपूर्ण सुराग मिला।
कई दिनों तक आरोपियों की गतिविधियों पर नजर रखने के बाद पुलिस ने एक रणनीति बनाई। यह ऑपरेशन बेहद शांत तरीके से, बिना किसी शोर-शराबे के अंजाम दिया गया। जब पुलिस ने छापा मारा, तो दोनों आरोपी हैरान रह गए—शायद उन्हें भी यकीन नहीं था कि दो दशक बाद भी कानून की पकड़ से बच पाना नामुमकिन है।
पकड़े जाने के बाद दोनों आरोपियों से पूछताछ जारी है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, वे इन सालों में फर्जी पहचान बनाकर छोटे-मोटे काम करते रहे और लगातार शहर बदलते रहे। लेकिन एक छोटी सी गलती ने उनकी असली लोकेशन का राज खोल दिया, और पुलिस ने मौका हाथ से नहीं जाने दिया।
यह गिरफ्तारी न सिर्फ एक पुराने केस को सुलझाने का मामला है, बल्कि उन परिवारों के लिए राहत की एक किरण है, जिन्होंने 23 साल से न्याय का इंतज़ार किया। दिल्ली पुलिस ने भी इस सफलता को बेहद महत्वपूर्ण मानते हुए जांच टीम को सम्मानित किया और यह संदेश दिया कि किसी भी अपराधी के लिए फरार रहकर बच निकलना संभव नहीं। न्याय भले ही देर से पहुंचे, लेकिन पहुंचेगा ज़रूर।

