दिल्ली के एक साधारण से सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले 11 साल के बच्चे के साथ जो कुछ हुआ, उसने हर उस माता-पिता को डरा दिया है, जो रोज़ अपने बच्चे को भरोसे के साथ स्कूल भेजते हैं। यह कहानी सिर्फ एक छात्र की नहीं, बल्कि उस मासूमियत की है जिसे दो महीने तक लगातार डर, धमकी और प्रताड़ना के बीच जीना पड़ा—वो भी उस जगह पर, जिसे सीखने और सुरक्षित माहौल का घर माना जाता है।
पीड़ित बच्चा, जो पहले बेहद हंसमुख और बातूनी था, अचानक चुप रहने लगा। उसके चेहरे की मुस्कान गायब होने लगी। हर सुबह स्कूल जाने के नाम पर उसकी आँखों में एक अजीब सा डर साफ दिखता था। माँ जब पूछती—“क्यों बेटा, क्या बात है?”—तो वह बस इतना कहकर चुप हो जाता, “कुछ नहीं हुआ, बस मन नहीं करता।”
किसे पता था कि बच्चे के भीतर कितना गहरा तूफ़ान चल रहा है।
बच्चे ने हिम्मत करके दो महीने बाद जो बताया, उसने परिवार को अंदर तक हिला दिया। उसने बताया कि उसके सीनियर छात्र उसे रोज़ परेशान करते थे। कभी जमीन पर बैग फेंककर उठाने को कहते, कभी सारा लंच ब्रेक उसका मज़ाक उड़ाते। कई बार उसे धक्का दिया जाता, थप्पड़ मारे जाते, और सबसे दर्दनाक—उसे धमकाया जाता कि अगर उसने किसी को बताया तो अंजाम बहुत बुरा होगा।
सोचिए, सिर्फ 11 साल का बच्चा…
जो खुद अभी डरना और समझना सीख रहा है, उसे रोज़ ऐसे बच्चों ने सताया जो उससे बड़े और ताक़तवर थे। वह चुप रहा क्योंकि उसे डर था, और शायद एक उम्मीद भी कि “शायद कल बेहतर होगा…”
लेकिन वह कल कभी आया ही नहीं।
जब बच्चे ने रोते-रोते अपनी माँ को सब बताया, तो माँ का दिल जैसे टूट गया। एक मां के लिए इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता है कि उसका बच्चा स्कूल के नाम से ही घबराने लगे? परिवार तुरंत स्कूल पहुँचा, लेकिन पहले तो प्रशासन ने मामले को हल्का बताने की कोशिश की। जैसे यह कोई “बच्चों की शरारत” हो—लेकिन यह शरारत नहीं, किसी के बचपन के साथ खिलवाड़ था।
जब मामला पुलिस तक पहुंचा, तब जाकर स्कूल सक्रिय हुआ। अब POSCO एक्ट के तहत जांच चल रही है। शामिल सीनियर छात्रों की पहचान की जा रही है और अनुशासनात्मक कार्रवाई का दावा भी किया जा रहा है। लेकिन सवाल अभी भी वही है—यह सब इतनी देर तक चल कैसे गया? किसकी जिम्मेदारी थी यह देखना कि एक छोटा सा बच्चा रोज़ किस यातना से गुजर रहा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि इतने छोटे बच्चों पर बुलिंग का असर बहुत गहरा होता है। वे इसे शब्दों में बयां नहीं कर पाते, लेकिन अंदर से टूट जाते हैं। कई बार बच्चा अपनी इज्जत, डर या शर्म के कारण परिवार को कुछ नहीं बताता, और अकेला ही पूरे दर्द को सहता रहता है। यही इस बच्चे के साथ भी हुआ।
घरवालों का दिल आज भी इस सोच से काँप जाता है कि अगर बच्चा कुछ और देर तक चुप रहता, तो उसकी मानसिक स्थिति पर क्या असर पड़ता? क्या वह खुद को संभाल पाता? क्या वह फिर से स्कूल जाने का हौसला जुटा पाता?
यह घटना सिर्फ एक समाचार नहीं, बल्कि एक आईना है—जो दिखाती है कि स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर कितनी खामियाँ हैं। हमें बच्चों को यह भरोसा दिलाना होगा कि वे किसी भी परेशानी में खुलकर बोल सकें। स्कूलों को भी यह समझना होगा कि किसी भी तरह की बुलिंग “सिर्फ बच्चों की बात” नहीं होती—यह एक बच्चे की आत्मा पर चोट करती है।
सरकार, स्कूल प्रशासन, शिक्षक, अभिभावक—सबको मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ हर बच्चा सुरक्षित महसूस करे। जहाँ वह सीखने जाए, डरने नहीं। जहाँ उसे दोस्त मिलें, दुश्मन नहीं।
यह मामला हमें याद दिलाता है कि बच्चों की दुनिया उतनी सरल नहीं जितनी हम सोचते हैं। और उन्हें हमारी संवेदनशीलता, ध्यान और सुरक्षा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
यह भी पढ़ें: https://delhidarpantv.com/alert/

