-राजेंद्र स्वामी , दिल्ली दर्पण
नई दिल्ली: दिल्ली नगर निगम के केशवपुरम ज़ोन में कानून अब अधिकारियों की मेजों के नीचे दफन हो चुका है। वज़ीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया की बिल्डिंग A-91 अब महज़ एक अवैध निर्माण नहीं, बल्कि दिल्ली नगर निगम की बेशर्मी का सबसे बड़ा स्मारक बन चुकी है। दिल्ली दर्पण टीवी द्वारा सबूतों के साथ इस काले खेल को बेनकाब करने के एक महीने बाद भी, निगम के डीसी और इंजीनियरों का ‘बिल्डर प्रेम’ थमने का नाम नहीं ले रहा है। इलाके में दबी जुबान में नहीं, बल्कि अब खुलेआम चर्चा है कि इस अवैध ‘महल’ को ढाल देने के लिए 1 करोड़ रुपये का ‘नज़राना’ अफसरों और सफेदपोशों की तिजोरियों तक पहुँच चुका है। आखिर और क्या वजह हो सकती है कि लिखित शिकायत, वीडियो सबूत और कोर्ट के डंडे के बावजूद, केशवपुरम ज़ोन के अधिकारियों को यह चार-मंज़िला अवैध इमारत दिखाई नहीं दे रही ? क्या डीसी साहब की आँखों पर भ्रष्टाचार के चश्मे ने मोतियाबिंद का काम किया है? स्थानीय पार्षद और पूर्व ज़ोन चेयरमैन योगेश वर्मा का ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा अब वज़ीरपुर के गलियारों में जोक (Joke) बन चुका है। खबर दिखाए जाने के एक महीने बाद भी पार्षद साहब की चुप्पी चीख-चीख कर कह रही है कि सत्ता के गलियारों में सब कुछ ठीक नहीं है। क्या जनप्रतिनिधि अब जनता के हितों के बजाय बिल्डर के हितों के ‘चौकीदार’ बन गए हैं?

बिल्डर का ‘मैनेजर’ बने डीसी साहब !
कोर्ट ने ‘प्राकृतिक न्याय’ के नाम पर बिल्डर को सुनने का आदेश दिया था, लेकिन डीसी साहब ने इसे ‘कार्रवाई टालने का लाइसेंस’ समझ लिया। बिल्डर सचिन जैन को बार-बार नोटिस दिए गए, वह नहीं आया। सामान्य प्रक्रिया में, यदि नोटिस के बाद कोई पेश न हो तो तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन यहाँ डीसी साहब किसी ‘शाही फरमान’ का इंतज़ार कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि डीसी खुद बिल्डर को गाइड कर रहे हैं कि कानून की पेचीदगियों का फायदा उठाकर कार्रवाई को कैसे ठंडे बस्ते में डाला जाए। जब भी दिल्ली दर्पण टीवी की टीम डीसी संदीप कुमार या अधिशासी अभियंता ललित से सवाल पूछने पहुँचती है, ये अधिकारी किसी भगोड़े की तरह दफ्तर से नदारद मिलते हैं। फोन न उठाना और दफ्तर से गायब रहना साफ़ दर्शाता है कि इनके पास अपनी ‘गुलामियत’ को सही ठहराने के लिए कोई शब्द नहीं बचे हैं। वज़ीरपुर में सील फैक्ट्रियों और बैंक्वेट हॉलों का धड़ल्ले से चलना बता रहा है कि MCD किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रही है। क्या प्रशासन तब जागेगा जब यहाँ भी कोई बड़ी इमारत गिरेगी या आग लगेगी? या फिर अधिकारियों ने यह मान लिया है कि 1 करोड़ की रिश्वत के आगे इंसानी जान की कोई कीमत नहीं है ?

