Thursday, February 26, 2026
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अदिति महाविद्यालय की छात्राओं ने मंच पर जीवंत किया विभाजन का दर्द, “झूठा सच” देख रो पड़ा पूरा सदन

अर्पिता गुप्ता , दिल्ली दर्पण ब्यूरो 

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के अदिति महाविद्यालय में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) के सौजन्य से आयोजित नाट्य मंचन ‘झूठा सच’ ने इतिहास के उन जख्मों को एक बार फिर हरा कर दिया, जिसे आज की पीढ़ी केवल किताबों में पढ़ती आई है। प्रसिद्ध लेखक यशपाल के कालजयी उपन्यास पर आधारित इस नाटक में छात्राओं ने विभाजन की विभीषिका, अपनों को खोने के डर और विस्थापन के अत्याचारों को इतनी शिद्दत से पेश किया कि ऑडिटोरियम में बैठा हर शख्स भावुक हो उठा। जैसे-जैसे नाटक आगे बढ़ा, दर्शकों की सिसकियाँ और तालियों की गड़गड़ाहट एक साथ गूंजती रही।

नाटक की शुरुआत में दिखाया गया कि कैसे सब कुछ सामान्य चल रहा था और लोग मिल-जुलकर रहते थे, लेकिन अचानक विभाजन के ऐलान ने सब कुछ बदल दिया। जो पड़ोसी कल तक एक-दूसरे पर जान छिड़कते थे, वे मजहब की दीवार खड़ी होते ही एक-दूसरे की जान के दुश्मन बन गए। कहानी मुख्य पात्र जयदेव और कनक के इर्द-गिर्द घूमती है, जो इस दंगों और अफरा-तफरी के बीच एक-दूसरे से बिछड़ जाते हैं। मंच पर कलाकारों ने भीड़ से डरे हुए चेहरे और अचानक चीख-पुकार में बदलती गीत-संगीत की आवाज़ों के जरिए उस खौफनाक मंजर को हूबहू सामने लाकर रख दिया।

इस नाट्य मंचन की सबसे बड़ी विशेषता कॉलेज की छात्राओं का शानदार अभिनय रहा। हैरानी की बात यह है कि ये छात्राएँ कोई पेशेवर कलाकार नहीं हैं, लेकिन NSD के विशेषज्ञों द्वारा दी गई महज कुछ दिनों की कड़ी ट्रेनिंग ने इन्हें मंझे हुए कलाकारों में बदल दिया। ट्रेन के भीतर ठूस-ठूसकर भरे लोग, अपनों से बिछड़ने की तड़प और भारत पहुँचने के बाद भी पहचान के लिए संघर्ष करते किरदारों को छात्राओं ने अपनी रगों में उतार लिया था। नाटक के अंत में जब जयदेव और कनक का मिलन हुआ, तब तक दर्शकों की आँखों से आंसू बह रहे थे, हालांकि विभाजन द्वारा छोड़े गए सवालों के जवाब आज भी अनुत्तरित दिखे।


कार्यक्रम के अंत में कॉलेज की प्राचार्या ने छात्राओं के जुनून की सराहना करते हुए कहा कि इन बेटियों के अभिनय ने विश्वास दिला दिया है कि यदि सही मार्गदर्शन मिले तो प्रतिभा को निखरने में वक्त नहीं लगता। नाटक की संयोजिका प्रो. मंजू रानी और सह-संयोजिका प्रो. मधु लोमेश ने बताया कि कैसे काबिल बच्चों का चयन कर उन्हें पात्रों के अनुसार तैयार किया गया। अंततः यह नाटक केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि अमन और भाईचारे का एक बड़ा संदेश बनकर उभरा, जिसने यह साबित कर दिया कि नक्शों पर खींची गई लकीरें दिलों के जख्म नहीं भर सकतीं।

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