दिल्ली दर्पण ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने यूथ कांग्रेस अध्यक्ष उदय भानु चिब की गिरफ्तारी के मामले में दिल्ली पुलिस की सख्त खिंचाई की है। कोर्ट ने पुलिस के उस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया जिसमें FIR की कॉपी देने से मना किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को उसके अपराध की जानकारी दिए बिना हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 का सीधा उल्लंघन है। पुलिस की इस कार्यप्रणाली से एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या लोकतांत्रिक प्रदर्शन को दबाने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं का दुरुपयोग किया जा रहा है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने दिल्ली पुलिस की उस कोशिश को नाकाम कर दिया जिसमें एक सामान्य प्रदर्शन को “आतंकवाद या उग्रवाद” जैसा गंभीर बताकर पेश किया जा रहा था। कोर्ट ने दो-टूक शब्दों में कहा कि यह महज एक ‘प्रतीकात्मक विरोध’ (Symbolic Protest) था और इससे जांच को कोई खतरा नहीं है। अदालत की इस टिप्पणी ने पुलिस द्वारा पैदा किए गए उस भ्रम को तोड़ दिया है जिसके तहत इसे एक बड़ी साजिश के रूप में दिखाने की कोशिश की जा रही थी। बिना FIR के गिरफ्तारी ने पुलिस की नियत पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस पूरे प्रकरण से यह साफ संदेश गया है कि सरकार और पुलिस मिलकर विरोध की आवाज को डराने की कोशिश कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ समय में दिल्ली पुलिस का रवैया एक ‘पुलिस स्टेट’ की तरह होता जा रहा है, जहाँ कानूनी मर्यादाओं को ताक पर रखकर कार्रवाई की जाती है ताकि आंदोलनकारियों को सबक सिखाया जा सके। हालांकि, कोर्ट के इस कड़े रुख ने यह साफ कर दिया है कि लोकतांत्रिक देश में नागरिकों के अधिकारों को मनमाने तरीके से नहीं छीना जा सकता।
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