Sunday, February 15, 2026
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आत्महत्या को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा बयान

अंशु ठाकुर, दिल्ली दर्पण टीवी

दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में एक आत्महत्या के मामले में सुनवाई के दौरान जो कहा, वह केवल कानून नहीं, बल्कि समाज की सोच को भी दिशा देने वाला है. कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा हर आत्महत्या के लिए किसी को दोष देना न्याय नहीं होता. दिल्ली हाई कोर्ट ने आत्महत्या के एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि पारिवारिक झगड़े या मानसिक तनाव अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसावे का आधार नहीं बनते.

कोर्ट ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति को सक्रिय रूप से आत्महत्या के लिए उकसाया न गया हो, साजिश न रची गई हो या जान बूझकर मदद न की गई हो, तब तक उसे आत्महत्या के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता. यह टिप्पणी जस्टिस रविंदर डूडेजा ने उस वक्त की जब उन्होंने एक व्यक्ति और उसकी पत्नी को अग्रिम जमानत दी. दोनों पर आरोप था कि उनके कारण महिला के पति ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी.

मामले में मृतक की पत्नी ने पहले पति के खिलाफ अप्राकृतिक यौन संबंध का मामला दर्ज कराया था. इसके बाद पति ने आत्महत्या कर ली और आरोपियों के खिलाफ एक व्हाट्सएप संदेश और सुसाइड नोट छोड़ा, जिसमें उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया. अभियोजन पक्ष ने इन्हीं तथ्यों के आधार पर दोनों की जमानत का विरोध किया.

हालांकि याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने मृतक की मानसिक स्थिति से जुड़े कई मेडिकल दस्तावेज रखे, जिनमें दिखाया गया कि वह डिप्रेशन, बायपोलर डिसऑर्डर और आत्मघाती प्रवृत्ति से पीड़ित था. साथ ही, कोर्ट में पेश किए गए ऑडियो रिकॉर्डिंग के ट्रांसक्रिप्ट में यह भी सामने आया कि मृतक आरोपियों को गालियां देता था और उन्हें फंसाने की धमकी देता था.

दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर आत्महत्या का मामला, उकसावे का मामला नहीं होता. ऐसे मामलों में यह देखा जाना जरूरी है कि क्या आरोपी का व्यवहार ऐसा था कि कोई सामान्य व्यक्ति आत्महत्या जैसा कदम उठाता. केवल सुसाइड नोट में किसी का नाम होना पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उकसावे के ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण न हों. इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने दोनों आरोपियों को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी.

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