- दिल्ली दर्पण ब्यूरो
- नई दिल्ली: एक तरफ, देश में सख्त कानूनों की बात होती है और दूसरी ओर अशोक विहार में एक ऐसा मामला सामने आया है, जहाँ पुलिस की घोर लापरवाही और बैंकों की आँख मूँद कर की गई कार्रवाई ने एक जालसाज परिवार को खुलेआम घूमने का मौका दे दिया। यह मामला न सिर्फ पुलिस की निष्क्रियता पर गंभीर सवाल उठता है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि क्या बैंक इतने गैर-जिम्मेदार हो सकते हैं कि वे करोड़ों रुपये के लोन फर्जी कागजात के आधार पर दे दें ? और क्या दिल्ली पुलिस इतनी लापरवाह या लालची हो सकती है कि उसे शिकायत और सूचना देने व आरोपियों को थाने में लाने के बाद भी उन्हें खुला छोड़ दे। पुलिस की इस लापरवाही और लालच की वजह यह गैंग ना केवल आज़ाद घूम रहा है बल्कि और भी लोगों और बैंकों को ठगी का शिकार बना रहा है।
मामला अशोक विहार थाना क्षेत्र का है। यहाँ बालकिशन नाम के एक शख्स को फेज -2 में एक प्रॉपर्टी 1.35 करोड़ रुपये में बेचने का करार करते हुए अभिषेक बत्रा ने ओर्जिनल पेपर ले लिए। बाद में मालूम हुआ की इस प्रॉपर्टी पर तो लोन है। उसकी जानकारी में यह भी आया की यह संगठित रूप से लोगों को नकली पेपर के बल पर ऐसे ही ठगी करते है। इसकी शिकायत अशोक विहार थाने में तो जांच में पता लगा की इसने तो कई बैंकों से इसी प्रॉपर्टी पर लोन किया है।
इस मामले में मुख्य आरोपी अभिषेक नाथ श्रीवास्तव है, जिस पर बालकिशन से धोखाधड़ी करने का आरोप है। लेकिन, कहानी यहीं खत्म नहीं होती। छानबीन से पता चला है कि यह एक संगठित परिवारिक जालसाजी का मामला है। आरोपी Mahima Batra के पति Kamal Batra जेल में हैं, जबकि उनके पिता Surendra Batra जमानत पर बाहर हैं। इस पूरे परिवार की करतूतों से साफ है कि इन्होंने न सिर्फ आम लोगों को बल्कि कई बैंकों को भी ठगा है।
इस मामले में कोर्ट के दखल के बाद पुलिस को हरकत में आना पड़ा है। इस मामले में यूपी के धनखोर थाना में FIR 215 / 2024 दर्ज़ है। इसकी खबर दिल्ली दर्पण टीवी पर दिखाई गए तो इन गिरोह के पीड़ितों का पिटारा से खुल गया। नॉएडा में भी इस गैंग ने एक बुजुर्ग दंपप्ती और अमेरिका मे रहे रहे उनके दामाद के खाली प्लाट के नकली पेपर बनाकर उसे बेच दिया। इस मामले में कमल बत्रा और इसके साथी जेल में है और उनके पिता सुरेश बत्रा जमानत पर बहार है। उनके नकली पेपर बनाया , मुर्दा ज़िंदा बताकर कोर्ट और सरकारी विभागों को गुमराह किया।
बालकिशन को जिस प्रॉपर्टी का सौदा किया गया था, उसी एक प्रॉपर्टी पर पाँच अलग-अलग बैंकों से फर्जी कागजात के आधार पर कुल 5.47 करोड़ रुपये का लोन लिया गया था। सवाल उठता है कि क्या बैंक बिना किसी ठोस जाँच-पड़ताल के इतनी बड़ी रकम का लोन कैसे दे सकते हैं? क्या यह बैंकों की लापरवाही का चरम है या फिर यह जालसाज इतने शातिर हैं कि उन्होंने कानूनी खामियों का पूरा फायदा उठाया? यह मामला साबित करता है कि ऐसे नटवरलाल कानून के साथ मिलकर खेल रहे हैं।
अशोक विहार पुलिस की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में अशोक विहार पुलिस स्टेशन की भूमिका बेहद शर्मनाक रही है। बालकिशन ने पुलिस को लिखित शिकायत दी थी, लेकिन पुलिस ने समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की। यदि अशोक विहार पुलिस समय रहते इन जालसाजों को पकड़ लेती, तो कई और लोग इनके हाथों लुटने से बच जाते। पुलिस की यह उदासीनता और कथित मिलीभगत साफ तौर पर यह दर्शाती है कि कानून का रखवाला ही अगर कमजोर पड़ जाए, तो अपराधियों के हौसले बुलंद हो जाते हैं। कोर्ट ने भी इस मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़े प्रहार करते हुए FIR दर्ज करने का आदेश दिया है।
बालकिशन को न्याय पाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा, यह अपने आप में पुलिस व्यवस्था की असफलता का प्रमाण है। जब तक पुलिस इस तरह के मामलों में त्वरित और ईमानदार कार्रवाई नहीं करती, तब तक आम जनता का भरोसा कानून और व्यवस्था से उठता रहेगा।
Ashok Vihar | पुलिस की सांठगांठ और बैंकों की लापरवाही : इन नटवरलालों के आगे कानून बेबस ?
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