नई दिल्ली:
भारत रत्न से सम्मानित पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय राजनीति का अजातशत्रु कहा जाता है। वैचारिक मतभेदों के बावजूद उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों से हमेशा गरिमा, संवाद और परस्पर सम्मान का रिश्ता बनाए रखा। नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के शासनकाल में अटल बिहारी वाजपेयी एक मजबूत विपक्षी नेता के रूप में उभरे, लेकिन निजी रिश्तों में कभी कटुता नहीं आने दी।
पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक, तीन पीढ़ियों के साथ अटलजी के संबंध भारतीय संसदीय लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा का उदाहरण माने जाते हैं।
जवाहरलाल नेहरू से गुरु-शिष्य जैसा संबंध
अटल बिहारी वाजपेयी 1957 में पहली बार सांसद बने। संसद में उनके ओजस्वी भाषणों से तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू बेहद प्रभावित हुए। एक बार उन्होंने एक विदेशी मेहमान से अटलजी का परिचय कराते हुए कहा था—“ये नेता एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बनेगा।”
संसद में एक बहस के दौरान वाजपेयी ने नेहरू की तुलना चर्चिल और चैंबरलेन से की थी। इसके बाद एक भोज में नेहरू ने मुस्कुराते हुए अटलजी से कहा कि उनका भाषण बहुत प्रभावशाली था। यह संवाद दोनों के बीच आपसी सम्मान को दर्शाता है।
1977 में जब अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने और उन्होंने अपने कार्यालय से नेहरू की तस्वीर हटी देखी, तो तुरंत उसे वापस लगवाने का आदेश दिया। यह कदम उनके व्यक्तित्व की परिपक्वता को दर्शाता है।
इंदिरा गांधी से टकराव भी, सहयोग भी
इंदिरा गांधी के साथ अटलजी के रिश्ते सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव वाले रहे। वे उनके सबसे मुखर आलोचकों में शामिल थे, लेकिन राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर उन्होंने कभी राजनीति को आड़े नहीं आने दिया।

1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी सरकार के फैसलों का खुलकर समर्थन किया। पाकिस्तान के हमले की निंदा करते हुए उन्होंने बांग्लादेश को मान्यता देने के निर्णय को सही ठहराया और कहा कि देश की एकता के लिए बलिदान आवश्यक है।
आपातकाल के दौरान वाजपेयी को जेल भी जाना पड़ा, जिससे राजनीतिक कड़वाहट बढ़ी, लेकिन इसके बावजूद इंदिरा गांधी कई अहम मुद्दों पर उनसे राय लेती रहीं। शिमला समझौते के दौरान बारिश में इंदिरा गांधी का अटलजी के सिर पर छाता पकड़ना, उनके रिश्ते की सहजता का प्रतीक माना जाता है।
राजीव गांधी से सबसे आत्मीय रिश्ता
राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के संबंधों को सबसे आत्मीय माना जाता है। 1980 के दशक में जब अटलजी गंभीर किडनी बीमारी से जूझ रहे थे और उन्हें इलाज के लिए अमेरिका जाना था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने व्यक्तिगत रूप से उनकी मदद की।

राजीव गांधी ने अटलजी को अपने कार्यालय बुलाया और उन्हें संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर न्यूयॉर्क जाने की व्यवस्था करवाई। राजीव गांधी की हत्या के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने भावुक होकर कहा था—“अगर आज मैं जीवित हूं, तो राजीव गांधी की वजह से हूं।”
राजनीति से ऊपर मानवीय रिश्ते
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में उस दौर के प्रतीक रहे, जहां तीखे राजनीतिक मतभेदों के बावजूद निजी रिश्तों में मर्यादा और सम्मान बना रहता था। उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना, भारतीय लोकतंत्र की उसी परंपरा को याद करना है।
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