दिल्ली फिर से एक मोड़ पर खड़ी है। वही पुरानी कहानी — शराब नीति। वही वादे, वही सुधार की बातें। फर्क बस इतना है कि इस बार हवा में उम्मीद कम, शक ज़्यादा है। लोग पूछ रहे हैं — “क्या इस बार सच में कुछ अच्छा होगा?”
नीति की पुरानी कहानी – सुधार का सपना, और सियासत की धूल
कुछ साल पहले जब दिल्ली में नई शराब नीति आई थी, तो उसे “सुधार” कहा गया था। सरकार ने कहा था — अब सब कुछ पारदर्शी होगा, राजस्व बढ़ेगा, और अवैध बिक्री पर रोक लगेगी।
पर धीरे-धीरे ये सपना बिखर गया।
जांच एजेंसियां आईं, गिरफ्तारी हुईं, बयानबाज़ी शुरू हुई, और जनता फिर से वही सोचने लगी — “हमारे शहर में आखिर कुछ भी टिकता क्यों नहीं?”
अब सरकार फिर से नई नीति लाने जा रही है। लेकिन इस बार हवा में वो उत्साह नहीं है जो पहले था। अब लोग सतर्क हैं, चुपचाप देख रहे हैं, जैसे कोई पुरानी फिल्म का सीक्वल चल रहा हो — कहानी वही, किरदार वही, बस नाम नया।
क्या बदलने वाला है इस बार?
इस बार कहा जा रहा है कि सरकार फिर से सरकारी शराब की दुकानें बढ़ाने की सोच रही है। यानी निजी हाथों में जो दुकानें दी गई थीं, अब उन्हें सरकार फिर से अपने नियंत्रण में लेना चाहती है।
कहा जा रहा है कि इससे दामों और गुणवत्ता पर निगरानी आसान होगी।
लेकिन व्यापारी चिंतित हैं — उनका कहना है कि हर बार जब नीति बदलती है, तो उनका पूरा बिज़नेस हिल जाता है।
इसके अलावा, शराब की बिक्री के समय और जगह पर भी नए नियम बनने की चर्चा है।
कई इलाकों के लोग शिकायत कर रहे थे कि उनके घरों के पास शराब की दुकानें खुली हैं — रात में हंगामा, झगड़े, गाड़ियां खड़ी करना, और बच्चों के सामने गलत माहौल।
सरकार कह रही है कि इस बार इन बातों को ध्यान में रखा जाएगा।
व्यापारियों का डर और उम्मीदें
जो निजी कंपनियां पहले लाखों-करोड़ों लगाकर ठेके ले चुकी थीं, उनके लिए यह बदलाव जैसे झटका है।
एक व्यापारी ने कहा फिर भी कुछ लोग आशावादी हैं। उनका कहना है,
आम लोगों के लिए इसका मतलब क्या है?
हर दिल्लीवाले के मन में एक ही सवाल — अब शराब महंगी होगी या सस्ती?
अगर सरकारी दुकानें बढ़ती हैं, तो शायद दाम थोड़ा कंट्रोल में रहे।
लेकिन निजी दुकानों की संख्या कम हुई, तो प्रतिस्पर्धा घटेगी — यानी दाम ऊपर जा सकते हैं।
लोग उम्मीद कर रहे हैं कि शायद इस बार सरकार ऑनलाइन डिलीवरी को फिर से शुरू करे —
“हर बार दुकान जाना आसान नहीं होता,” एक कामकाजी महिला ने कहा, “अगर घर तक किराना आ सकता है, तो शराब क्यों नहीं?”
नीति से ज़्यादा राजनीति
दिल्ली में शराब की नीति सिर्फ व्यापार नहीं, सियासत का मुद्दा है।
एक तरफ वो लोग हैं जो कहते हैं कि शराब से सरकार की आमदनी बढ़ती है, दूसरी तरफ वो लोग जो कहते हैं — “ये समाज को बर्बाद कर रही है।”
विपक्ष और सत्ताधारी दल दोनों तैयार हैं इस पर एक-दूसरे को घेरने के लिए।
और जनता? वो बस चाहती है कि इस बार वादे और हकीकत में थोड़ा फर्क न रह जाए।
आख़िर में सवाल बस एक है
क्या इस बार दिल्ली की शराब नीति वाकई “नीति” बनेगी — या फिर एक और “ड्रामा”?
सरकार कह रही है कि सब कुछ जनहित में होगा, पारदर्शी होगा, बेहतर होगा।
लेकिन लोगों को अब भाषणों से ज़्यादा भरोसा नतीजों पर है।
दिल्ली की सड़कों पर, उन दुकानों के बाहर, जहां शाम ढलते ही भीड़ लगती है — लोग अब चुपचाप देख रहे हैं।
हर कोई बस यही सोच रहा है — “देखते हैं, इस बार बोतल में क्या निकलेगा. सुधार या फिर सियासत?

