नई दिल्ली:
जनकपुरी में 15 फीट गहरे गड्ढे में गिरकर युवक कमल की मौत के मामले में अब सवाल सिर्फ हादसे का नहीं, बल्कि पुलिस और प्रशासन की भूमिका का बन गया है। मौके पर निरीक्षण कर लौटे रमेश वर्मा ने भले ही कमेटी गठन और जेई को सस्पेंड करने की बात कही हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है।
स्थानीय लोगों और परिजनों का कहना है कि कमेटी बनना कोई नई बात नहीं, इससे पहले भी नोएडा जैसे मामलों में हफ्तों “कमेटी-कमेटी” हुआ, लेकिन नतीजा शून्य रहा। सवाल यह है कि क्या इस बार भी वही लीपापोती दोहराई जा रही है?
बैरिकेडिंग सुबह लगी, रात में कहां थी?
जिस गड्ढे में कमल, उसकी बाइक और उसकी लाश मिली, उस जगह पर सुबह-सुबह बैरिकेडिंग दिखाई दी। आरोप है कि रात के समय वहां कोई बैरिकेडिंग नहीं थी। अगर सुरक्षा इंतज़ाम पहले से मौजूद थे, तो फिर बाइक वहां कैसे पहुंची? क्या वह “हवा में उड़कर” गड्ढे में गिर गई?
यह सवाल तब और गंभीर हो जाता है जब मंत्री खुद मौके पर पहुंचकर यह बयान देते हैं कि “सब कुछ मौजूद था।” स्थानीय लोगों का आरोप है कि मंत्री स्तर से ही लीपापोती की शुरुआत हो गई, ऐसे में विभागीय कार्रवाई से इंसाफ की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
CCTV कैमरे मौजूद, फिर फुटेज में देरी क्यों?
घटनास्थल पर स्पष्ट रूप से CCTV कैमरे लगे हुए हैं। B1C3A, जनकपुरी क्षेत्र में कैमरा मौजूद होने के बावजूद सवाल उठता है कि पुलिस को CCTV फुटेज लेने में इतनी देरी क्यों हुई?
सबसे अहम सवाल यह है कि:
- रात की फुटेज अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
- सुबह बैरिकेडिंग किसने और क्यों लगाई?
- पूरे क्राइम सीन को किसके आदेश पर “ड्रेस अप” किया गया?
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर CCTV फुटेज सामने आ जाए, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
फोन ऑन था, फिर भी रात में तलाश क्यों नहीं?
कमल का फोन घटना के बाद भी ऑन था। परिजनों का आरोप है कि पुलिस के पास लोकेशन मौजूद थी, फिर भी:
- रात में लोकेशन शेयर क्यों नहीं की गई?
- बाद में लोकेशन डिलीट क्यों कर दी गई?
- छह थानों के चक्कर लगाने के बावजूद गुमशुदगी की रिपोर्ट क्यों दर्ज नहीं की गई?
परिजनों का दावा है कि पुलिस ने साफ़ तौर पर कहा, “सुबह आइए, रात में तलाश संभव नहीं है।” यही देरी कमल की जान पर भारी पड़ गई।
गैर-इरादतन हत्या का मामला, लेकिन किस पर?
जब सवाल उठाया गया कि क्या यह गैर-इरादतन हत्या (Culpable Homicide) का मामला बनता है, तो अधिकारियों ने “हां” तो कहा, लेकिन यह बताने में असमर्थ रहे कि मामला किसके खिलाफ बनता है। यही चुप्पी पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती है।
पुलिस पर डर का माहौल बनाने के आरोप
आरोप है कि दिल्ली पुलिस का रवैया केवल इस केस में ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर सवालों के घेरे में है। कहा जा रहा है कि:
- गुमशुदगी की बात करने पर FIR की धमकी दी जाती है
- गवाहों पर दबाव बनाकर बयान बदलवाए जाते हैं
- नोएडा जैसे मामलों में मदद करने वाले चश्मदीदों को पीछे हटने पर मजबूर किया गया
यह सब एक डर का माहौल तैयार करने की ओर इशारा करता है।
15 दिन में 800 से ज्यादा लापता, जवाब कौन देगा?
पुलिस के ही आंकड़ों के मुताबिक जनवरी के पहले 15 दिनों में 800 से ज्यादा लोग लापता हुए। इनमें बड़ी संख्या नाबालिग लड़कियों की भी है। सवाल यह है कि:
- ये लोग कहां जा रहे हैं?
- उन्हें ढूंढने में पुलिस की रुचि क्यों नहीं दिख रही?
- क्या इसके पीछे कोई संगठित मिलीभगत है?
मुआवज़ा नहीं, इंसाफ चाहिए
पीड़ित परिवार का कहना है कि मुआवज़ा कोई समाधान नहीं। पहले इंसाफ चाहिए। सवाल उठाया गया कि पिछले एक साल में दिल्ली में:
- कहीं डूबकर
- कहीं जलकर
- कहीं करंट लगने से
- कहीं दीवार गिरने से
100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। कितनों को मुआवज़ा मिला? आरोप है कि मुआवज़ा और नौकरियां सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं तक सीमित रखी गईं।
अगर टैक्सपेयर्स के पैसे से मुआवज़ा देना है, तो सभी पीड़ितों को समान अधिकार क्यों नहीं?
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