अशोक विहार (राजेंद्र स्वामी, दिल्ली दर्पण टीवी ): राजधानी का पॉश इलाका कहा जाने वाला अशोक विहार इन दिनों अतिक्रमण और भ्रष्टाचार की दोहरी मार झेल रहा है। दिल्ली दर्पण टीवी द्वारा किए गए रियलिटी चेक में यह खुलासा हुआ है कि अशोक विहार फेज-2 और फेज-3 के बीच की मुख्य सड़क अब सार्वजनिक संपत्ति न रहकर कार डीलरों का ‘प्राइवेट शोरूम’ बन चुकी है।
फुटपाथ गायब, सड़कों पर रेंगता ट्रैफिक
सड़क की स्थिति यह है कि फुटपाथ पर तो गाड़ियां कब्जा जमाए ही हुए हैं, मुख्य सड़क पर भी तीन-तीन कतारों में महंगी गाड़ियां खड़ी की जा रही हैं। हद तो तब हो जाती है जब इन सड़कों पर ही खुलेआम गाड़ियों की धुलाई होती है, जिससे न केवल सड़क खराब हो रही है बल्कि कीचड़ और जाम से आम जनता का निकलना दूभर हो गया है। ट्रैफिक रेंग कर चलता है, लेकिन जिम्मेदार मौन हैं।
सेटिंग का खेल: चालान या ‘अवैध वसूली का लाइसेंस’?
हैरानी की बात यह है कि कार डीलर कैमरे पर यह स्वीकार कर रहे हैं कि उन्हें एमसीडी या ट्रैफिक पुलिस से कोई डर नहीं है। डीलरों के मुताबिक, प्रशासन कभी-कभार 2-3 हजार रुपये का छोटा-मोटा चालान काटकर अपनी ‘खानापूर्ति’ कर लेता है, जिसके बदले उन्हें सड़क और फुटपाथ घेरने की खुली छूट मिल जाती है। स्थानीय RWA और निवासियों ने अब शिकायत करना भी छोड़ दिया है, क्योंकि उनका मानना है कि कार माफिया और प्रशासन का यह गठजोड़ अटूट है।
नेताओं के दावे बनाम हकीकत
क्षेत्र में ‘ट्रिपल इंजन’ की सरकार होने के बावजूद हालात बदतर हैं। स्थानीय सांसद प्रवीण खंडेलवाल बार-बार ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करते हैं और स्थानीय विधायक भी दौरों का दावा करती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत में कार माफिया के हौसले बुलंद हैं। जनता पूछ रही है कि क्या इन जनप्रतिनिधियों की आंखें इस खुलेआम हो रहे अतिक्रमण को देखने में असमर्थ हैं?
खोखा माफिया: मुर्दों के कागजों पर चल रहा धंधा
अतिक्रमण का यह जाल सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है। दीपचंद बंधु अस्पताल के पास और फेज-2 की मार्केट में खाने-पीने के खोखों की बाढ़ आ गई है। सूत्रों का दावा है कि एमसीडी के भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से एक बड़ा ‘पेपर माफिया’ सक्रिय है। ये माफिया उन पुराने लाइसेंसों के फर्जी कागजात तैयार कर रहे हैं जिनके असली मालिक अब नहीं रहे या लावारिस हैं।
सील तो कर दिया, पर हटाया क्यों नहीं?
फेज-1 में हाल ही में लगे एक अवैध खोखे पर जब दिल्ली दर्पण टीवी ने खबर दिखाई, तो एमसीडी ने आनन-फानन में उसे सील कर नोटिस चस्पा कर दिया। पूर्व जोन चेयरमैन और निगम पार्षद योगेश वर्मा ने मौके पर जाकर दो दिन में खोखा हटवाने का दावा किया था, लेकिन दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी वह खोखा अपनी जगह पर डटा हुआ है। यह देरी साबित करती है कि विभाग के भीतर ही कोई है जो इन माफियाओं को संरक्षण दे रहा है।
सवाल अब भी वही है: क्या अशोक विहार की जनता को कभी इन माफियाओं से मुक्ति मिलेगी, या प्रशासन की यह ‘सेटिंग’ इसी तरह चलती रहेगी?
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