दिल्ली दंगों को हुए तीन साल से ज्यादा वक्त गुजर चुका है, लेकिन उस दौर की टीस आज भी कई लोगों के दिल में ताज़ा है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजन खोए, उनके लिए ये घाव भरना आसान नहीं। इसी बीच, इस केस से जुड़े दो चर्चित नाम—शरजील ईमाम और उमर खालिद—एक बार फिर सुर्खियों में हैं। वजह है उनकी जमानत याचिका, जिस पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है।
दंगे और आरोपों की शुरुआत
फरवरी 2020 का महीना दिल्ली के लिए किसी डरावने सपने से कम नहीं था। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और NRC को लेकर देशभर में विरोध हो रहा था। उसी बीच, उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हालात बिगड़ गए। देखते ही देखते सड़कों पर आगजनी और हिंसा फैल गई।
इन्हीं दंगों में पुलिस की नज़र कुछ नेताओं और एक्टिविस्टों पर गई। शरजील ईमाम और उमर खालिद पर आरोप लगा कि उन्होंने भाषणों और बैठकों के जरिए माहौल भड़काया। पुलिस का कहना है कि इनकी बातों ने लोगों को हिंसा के लिए उकसाया। हालांकि, दोनों ने हमेशा यह कहा कि वे सिर्फ शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे और उन्हें जानबूझकर फंसाया गया है।
अदालत की राह
इन दोनों नेताओं की जमानत याचिका निचली अदालत और फिर दिल्ली हाई कोर्ट से खारिज हो चुकी है। दोनों ने अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है।
आज की सुनवाई इसलिए अहम है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला तय करेगा कि क्या इन्हें जमानत मिलेगी या ये जेल में ही रहेंगे। कानूनी जानकारों का मानना है कि अगर कोर्ट इन्हें राहत देता है, तो केस की दिशा बदल सकती है।
कोर्ट से बाहर का माहौल
इस केस का असर सिर्फ अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। इसका असर सड़कों पर और लोगों की सोच में भी दिखता है।
एक तरफ इनके समर्थक कहते हैं कि यह सब सरकार की साजिश है और इन्हें बेवजह जेल में रखा गया है। दूसरी तरफ दंगे में अपनों को खो चुके परिवारों का गुस्सा साफ झलकता है। एक पीड़ित परिवार का सदस्य बोला—
“हमने अपना बेटा खोया है। अगर इन्हें छोड़ दिया गया तो इंसाफ पर से भरोसा उठ जाएगा।”
वहीं, विश्वविद्यालय से जुड़े एक छात्र ने कहा—
“उमर और शरजील ने किसी को हिंसा के लिए नहीं कहा। उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।”
क्या कहती है पुलिस और बचाव पक्ष
पुलिस का दावा है कि उनके पास पुख्ता सबूत हैं—फोन रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयान। पुलिस का कहना है कि इन सबूतों से साफ होता है कि हिंसा की साजिश पहले से रची गई थी।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष का कहना है कि ये सारे सबूत कमजोर हैं और इनकी व्याख्या मनमुताबिक की जा रही है। वकीलों का तर्क है कि उनके मुवक्किल सिर्फ अपनी राय रख रहे थे और उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सज़ा दी जा रही है।
आज की सुनवाई से उम्मीदें
आज सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलें रखेंगे। कोर्ट को तय करना है कि जमानत देने से क्या गवाहों और जांच पर असर पड़ सकता है। अगर कोर्ट को खतरा दिखता है तो जमानत मुश्किल होगी। लेकिन अगर सबूतों में कमजोरी नजर आई तो इन्हें राहत मिल सकती है।
नतीजा
दिल्ली दंगा केस सिर्फ दो लोगों का केस नहीं है। ये उन परिवारों की उम्मीदों और भरोसे का मामला है, जिन्होंने उस हिंसा में सब कुछ खोया। आज की सुनवाई पर सबकी नज़रें टिकी हैं—क्योंकि यही तय करेगा कि इंसाफ का पहिया किस ओर घूमेगा।
लोग अब भी यही सवाल पूछ रहे हैं—क्या असली गुनहगार सज़ा पाएंगे, या राजनीति के शोर में सच दब जाएगा?

