– दिल्ली दर्पण ब्यूरो
नई दिल्ली: दिल्ली नगर निगम (MCD) में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं, इसका ताजा उदाहरण केशव पुरम जोन में देखने को मिल रहा है। दिल्ली दर्पण टीवी पर प्रमुखता से खबर दिखाए जाने के बाद अब यह मामला उच्च स्तर तक पहुँच गया है। वर्तमान में केशव पुरम जोन के डिप्टी कमिश्नर (DC) संदीप गहलोत गंभीर सवालों और जांच के घेरे में हैं। स्थानीय लोगों और सूत्रों का दावा है कि इस जोन में भ्रष्टाचार की सभी सीमाएं लांघ दी गई हैं। सरेआम बिना नक्शे के अवैध बिल्डिंगें खड़ी की जा रही हैं और नकली कागजों के आधार पर खोखे लगाए जा रहे हैं, लेकिन प्रशासन की आंखें पूरी तरह बंद हैं।
इस भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा केंद्र वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया का प्लॉट नंबर A-91 बना हुआ है। आरोप है कि खुद डीसी साहब ने इस अवैध निर्माण को संरक्षण दिया हुआ है। हैरानी की बात यह है कि निगम द्वारा सील की गई बिल्डिंगों में भी धड़ल्ले से निर्माण कार्य जारी है और सड़कों पर अतिक्रमण का बोलबाला है। जनता का सीधा आरोप है कि भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करने वाली भाजपा का यहाँ मज़ाक बन कर रह गया है। लोगों का कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो अधिकारी केवल ‘कलेक्शन’ के मकसद से ही यहाँ तैनात किए गए हैं।

इस बेखौफ भ्रष्टाचार के पीछे का मुख्य कारण निगम की ‘डेपुटेशन नीति’ को माना जा रहा है। दरअसल, एमसीडी के 12 जोन में तैनात ज्यादातर डीसी स्तर के अधिकारी बाहर से, जैसे रेलवे या अन्य केंद्रीय विभागों से डेपुटेशन पर आते हैं। केशव पुरम के डीसी संदीप गहलोत भी रेलवे विभाग से आए हैं। चूंकि ये अधिकारी सीधे गृह मंत्रालय के अधीन होते हैं, इसलिए दिल्ली का विजिलेंस विभाग या लोकायुक्त इनके खिलाफ सीधी कार्रवाई नहीं कर सकता। इनकी जांच की शक्ति केवल केंद्र सरकार के पास है। इसी कानूनी पेचीदगी का फायदा उठाकर ये अधिकारी बिना किसी डर के काम करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि अधिक से अधिक उनका तबादला ही होगा।
नगर निगम के भीतर भी यह मांग लंबे समय से उठ रही है कि डीसी के पदों पर एमसीडी के अपने कैडर के अधिकारियों को ही पदोन्नत कर उन्हें प्रमोट कर तैनात किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि निगम के अपने अधिकारियों को जमीन स्तर की पूरी जानकारी होती है और उन्हें भविष्य में प्रमोशन की चिंता और कार्रवाई का डर भी रहता है। इसके विपरीत, डेपुटेशन पर आए अधिकारियों का एमसीडी से कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं होता। वे कार्यकाल पूरा कर वापस चले जाते हैं और भ्रष्टाचार की गाज हमेशा उनके नीचे काम करने वाले निगम के छोटे कर्मचारियों पर गिरती है। इस मामले को दिल्ली नगर निगम नेता सदन , जोन चैयरमैन रहे योगेश वर्मा ने भी उठाया –उन्होंने हाल ही में सदन में साफ़ कहा डेपुटेशन पर एमसीडी में अधिकारीयों को भेजने की परम्परा बंद होनी चाहिए|
विडंबना यह है कि दिल्ली नगर निगम में ‘अपॉइंटमेंट कमेटी’ होने के बावजूद उसके पास नियुक्तियों की कोई वास्तविक शक्ति नहीं है। यह कमेटी केवल केंद्र से आए आदेशों की सूचना प्राप्त करने तक सीमित रह गई है। जब तक नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्थानीय अधिकारियों को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक केशव पुरम जैसे जोनों में भ्रष्टाचार के ऐसे ही मामले सामने आते रहेंगे। अब देखना यह है कि क्या गृह मंत्रालय और केंद्र सरकार इन गंभीर शिकायतों पर कोई ठोस संज्ञान लेते हैं या नहीं।

