उस रात दिल्ली की एक गली में सब सो रहे थे। लेकिन एक घर के अंदर, एक लड़की अपनी आख़िरी जंग हार रही थी।
26 साल की रीना (काल्पनिक नाम) — जो कभी बहुत हंसमुख थी, जिसके सपने अभी अधूरे थे, जिसकी जिंदगी की शुरुआत ही हुई थी — ने पंखे से रस्सी बांधी और चुपचाप दुनिया को अलविदा कह दिया।
कमरे में उसकी चूड़ियों की खनक अब कभी नहीं सुनाई देगी। तकिये में छुपाए उसके आंसू अब हमेशा के लिए सूख गए।
शादी का सपना, टूटे वादे
रीना की शादी को बस तीन साल हुए थे। जब वह दुल्हन बनी थी, तो आंखों में चमक थी, चेहरे पर लाज थी, और दिल में उम्मीदें थीं।
मायके वालों ने अपनी पूरी ताकत लगाकर शादी की थी। जो मां-बाप बेटी को पलकों पर रखते हैं, उन्होंने अपनी जमीन-जायदाद बेचकर, कर्ज लेकर दहेज दिया।
लेकिन शादी के बाद कहानी बदल गई।
“कार क्यों नहीं लाई?”
“इतने पैसे और चाहिए।”
“मायके से नया सामान मंगवा लो।”
ये मांगें रीना के कानों में रोज़ गूंजतीं। हर ताना उसके दिल को घायल कर देता। उसकी हंसी धीरे-धीरे गायब हो गई। वो लड़की जो सबको मुस्कान देती थी, अब खुद मुस्कुराना भूल गई थी।
मौत से पहले की खामोशी
पड़ोसियों का कहना है—”वो अक्सर खिड़की से बाहर देखती रहती थी। चुपचाप। जैसे किसी गहरे दर्द में हो।”
शायद वो सोचती थी—क्या यही है शादी? क्या यही है नई जिंदगी?
उस रात उसने किसी को आवाज़ नहीं दी। बस कमरे का दरवाजा बंद किया। रस्सी बांधी। और सब खत्म कर दिया।
सुबह जब दरवाजा तोड़ा गया, तो उसका शरीर लटका हुआ मिला। लेकिन उसकी आंखें… उसकी आंखें अब भी सवाल कर रही थीं—
“क्या मेरी गलती सिर्फ इतनी थी कि मैं बेटी बनकर पैदा हुई?”
माँ-बाप का टूटा आसमान
रीना की माँ का रो-रोकर बुरा हाल है। वे बार-बार बस यही कहती हैं—
“हमने सबकुछ दिया था… जो मांगा, सब लुटा दिया… फिर भी मेरी बेटी को क्यों नहीं छोड़ा? वो जीना चाहती थी… उसके सपने थे… लेकिन हमें उसकी लाश मिली।”
पिता बस खामोश हैं। उनकी आंखों में वो दर्द है जिसे शब्द कभी बयान नहीं कर सकते। जिसने अपनी बेटी को उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, अब उसी बेटी को कफन में सोता देखना पड़ा।
कानून और समाज
पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है। पति, सास और ससुर से पूछताछ हो रही है। मामला दहेज हत्या का है। लेकिन क्या सिर्फ केस दर्ज होने से फर्क पड़ेगा?
हर दिन, कहीं न कहीं, कोई रीना मर रही है। कोई जहर खाकर, कोई आग में जलकर, कोई फांसी लगाकर।
ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। ये उन बेटियों की चीखें हैं जो समाज की दीवारों से टकराकर लौट आती हैं।
असली सवाल
क्यों आज भी दहेज नाम की ये जंजीर बेटियों को मार रही है?
क्यों शादी अभी भी लेन-देन का सौदा है?
क्यों मायके वाले कर्ज में डूबते हैं, और फिर भी बेटी की खुशियां नहीं खरीद पाते?
क्यों हम सब खामोश रहते हैं, जब हमारे आसपास किसी को दहेज के लिए ताने दिए जाते हैं?
अब क्या बदलना चाहिए?
बदलाव सिर्फ कानून से नहीं आएगा। बदलाव हमें खुद लाना होगा।
बेटियों को दहेज नहीं, शिक्षा और आत्मनिर्भरता का तोहफा दीजिए।
शादी को दिखावे का सौदा मत बनाइए, इसे रिश्ते का पवित्र बंधन रहने दीजिए।
और सबसे जरूरी—दूसरों की बेटी को भी उतना ही सम्मान दीजिए जितना अपनी बेटी को देते हैं।

