– दिल्ली दर्पण ब्यूरो
नई दिल्ली: किसी भी सरकार के कार्यकाल का एक साल चर्चा में रहता है, चाहे वह मुख्यमंत्री-मंत्री हो या विधायक, उसके कार्यों की समीक्षा होती है। लेकिन दिल्ली के शकूरपुर से बीजेपी विधायक करनैल सिंह को लेकर चर्चा बीजेपी और उसके मंदिर प्रकोष्ठ में ही नहीं, बल्कि उनके इलाके में भी जमकर हो रही है। चुनाव से पहले जो वादे किए थे, जो सपने मंदिर प्रकोष्ठ से जुड़े पुजारियों को दिखाए थे, स्थानीय जनता को दिखाए थे; यह एक साल बीत जाने के बाद भी उनका जिक्र तक नहीं कर रहे हैं। सत्ता हासिल करने के लिए जो हथकंडे उन्होंने अपनाए, संघ, सनातन और पुजारियों का जिस तरह से इस्तेमाल किया, वह दिल्ली बीजेपी मंदिर प्रकोष्ठ के विधायक करनैल सिंह चर्चा के केंद्र में हैं।
पुजारियों के वेतन का वादा… और अब चुप्पी – राजनीति में वादों का बाजार हमेशा गर्म रहता है, लेकिन जब आस्था और पुजारियों के मान-सम्मान को सीढ़ी बनाकर सत्ता हासिल की जाए और फिर उन्हीं को भुला दिया जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है। कभी अरविंद केजरीवाल सरकार के खिलाफ हज़ारों पुजारियों को लेकर सड़कों पर उतरने वाले करनैल सिंह ने एक ही सपना दिखाया था — “दिल्ली में सनातन सरकार लाओ और पुजारियों का वेतन पाओ।” उस वक्त ब्राह्मण समाज और खाकसार पुजारियों ने उन पर भरोसा किया। आज दिल्ली में भाजपा की सरकार बने एक साल बीत चुका है और करनैल सिंह खुद विधायक की कुर्सी पर काबिज हैं, लेकिन पुजारियों के वेतन का मुद्दा ठंडे बस्ते में है।

NRI चोला और करोड़ों का साम्राज्य करनैल सिंह खुद को एक सफल NRI बताते हैं और अमेरिका में हज़ारों करोड़ के कारोबार का दावा करते हैं। चुनावी हलफनामे के मुताबिक वे दिल्ली के सबसे अमीर उम्मीदवारों में शुमार रहे हैं (करीब 259 करोड़ की संपत्ति)। लेकिन विडंबना देखिए, एक तरफ करोड़ों का मालिक होने का दावा और दूसरी तरफ उन पर छोटी-छोटी रकम की जालसाजी के आरोप लगते रहे हैं। हाल ही में उन पर मानहानि के मुकदमे और ‘बढ़-चढ़ाकर’ दावे करने के आरोप भी कोर्ट तक पहुँच चुके हैं।
काम के नाम पर ‘जय श्रीराम’ का जुमला शकूरबस्ती के स्थानीय लोगों के बीच अब एक नया जुमला मशहूर हो गया है— काम के नाम पर “जय श्रीराम”। लोगों का कहना है कि विधायक जी विकास कार्यों, टूटी सड़कों या सीवर की समस्याओं पर बात करने के बजाय हर वक्त धार्मिक आडम्बर में डूबे रहते हैं। भगवा चोला पहनकर वे खुद को ‘दिल्ली का योगी’ सिद्ध करने की कोशिश में रहते हैं, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि वे जनता की बुनियादी समस्याओं से दूर हो चुके हैं।
मुख्यमंत्री बनने की प्रबल इच्छा और ‘झूठे’ सपने सूत्रों की मानें तो 10वीं पास करनैल सिंह का अगला लक्ष्य दिल्ली के मुख्यमंत्री की गद्दी है। वे अपने करीबी घेरे में यह दावा करते फिरते हैं कि उन्हें सीधे मोदी और योगी ने दिल्ली भेजा है और एक साल बाद वे ही सूबे की कमान संभालेंगे। लेकिन सच तो यह है कि उनकी ‘कारगुजारियों’ की पोल खुलने के बाद पार्टी आलाकमान ने उन्हें मंत्री पद तक के लायक नहीं समझा। अब जब इन्हें आभास हो चुका है, तो ये मुख्यमंत्री की तारीफ़ में कसीदे पढ़ने लगे हैं और अपने फेसबुक पर उनकी पोस्ट को शेयर करने लगे हैं। सत्ता की इस भूख को शांत करने के लिए वे नए सपने बेच रहे हैं— किसी को सांसद बनाने का वादा, तो किसी को निगम चुनाव में पार्षद की टिकट का दिलासा। वे खुद को संघ प्रमुख सहित कई बड़े संतों का करीबी बताते हैं और बड़े-बड़े उद्योगपतियों को भी सब्जबाग दिखाते हैं।
नाराज संत और ब्राह्मण समाज- जिस समाज के दम पर उन्होंने चुनावी वैतरणी पार की, वही ब्राह्मण और संत समाज आज ठगा हुआ महसूस कर रहा है। उनकी ‘नई सोच’ केवल नाम बदलने (जैसे शकूरबस्ती का नाम बदलने की मांग) तक सीमित रह गई है, जबकि पुजारियों के हितों की बात अब उनके एजेंडे से गायब है। सवाल यह है कि क्या आडम्बर और नारों के सहारे दिल्ली की जनता को लंबे समय तक छला जा सकता है? या फिर ‘सपनों के ये सौदागर’ अपनी ही बुनी हुई जाल में फंस जाएंगे ?
यह भी पढ़ें:- https://delhidarpantv.com/aaps-big-attack-on-the-dalal-governments-decision-sarbh-bhardwaj-cm-raised-questions/

