Saturday, March 7, 2026
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Rohini Court -पिता की हत्या का आरोपी बेटा हुआ बलि, कमी पुलिस की नियत में या काबिलियत में?

 राजेंद्र स्वामी ,  दिल्ली दर्पण ब्यूरो

 हत्या का मकसद कितना भी मजबूत क्यों न हो, अगर पुलिस जांच कमजोर है तो न्यायालय भी हाथ बाँधकर खड़ा हो जाता है। वज़ीरपुर में पैतृक संपत्ति विवाद से जुड़े पिता की हत्या के इस मामले में रोहिणी कोर्ट का फैसला इसी सच को दोहराता है। मृतक रमेश भारद्वाज के बेटे लव भारद्वाज को अदालत ने सबूतों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया, जबकि दिल्ली पुलिस महीनों से उसे हत्या की साजिश का “मुख्य सूत्रधार” बताती रही। पुलिस का दावा आरोपी वकील प्रदीप खत्री  के तर्क और तथ्यों ने तार तार कर दिया।  अदालत ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा कि अभियोजन का पूरा मामला सिर्फ “मकसद” और “खुलासा बयान” पर आधारित है। ऐसे आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ हत्या की साजिश का मामला बन ही नहीं सकता। न्यायालय ने यह भी इशारा दिया कि पुलिस ने जितना जोर कहानी पर लगाया, उतना ही कम जोर सबूतों पर दिखाई देता है। पुलिस ने यह दावा किया कि संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद में बेटे ने सह–आरोपियों को दस लाख रुपये की सुपारी दी।

लेकिन अदालत में यह दिखाने के लिए पुलिस कोई कॉल रिकॉर्ड, कोई मोबाइल लोकेशन, कोई मनी ट्रेल और न ही कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष गवाह पेश कर सकी। यहां तक कि यह साबित करने के लिए भी कोई दस्तावेज नहीं था कि हत्या की साजिश रचने से पहले या बाद में लव भारद्वाज का कथित हत्यारों ,जितेंद्र और उसके बेटे अभिषेक विशाल से कोई संपर्क हुआ था। पुलिस का पूरा भरोसा सह–आरोपी अभिषेक के खुलासा बयान पर टिका रहा, जिसे अदालत ने कानूनी रूप से अविश्वसनीय और किसी तीसरे व्यक्ति के खिलाफ अनुपयोगी माना। आरोपी ले यही वह बिंदु था जहां बेटे के वकील प्रदीप खत्री ने पुलिस की जांच की कमजोरी को अदालत के सामने उजागर किया। उन्होंने तर्क दिया कि मकसद दिखा देना पर्याप्त नहीं, हत्या और आरोपी के बीच ठोस संबंध साबित होना आवश्यक है। जो इस मामले में पूरी तरह अनुपस्थित था। अदालत ने यह स्वीकार किया, और लव भारद्वाज पर लगे गंभीर आरोप ढहते चले गए। बचाव पक्ष ने किसी असाधारण कानूनी रणनीति से केस नहीं जीता, बल्कि पुलिस की जांच की खामियों ने खुद ही इतने बड़े आरोपों को खोखला बना दिया।उधर, सह–आरोपियों जितेंद्र और अभिषेक विशाल के खिलाफ अदालत ने मुकदमा चलाने का आदेश दिया है। उनके विरुद्ध सबूत ठोस हैं।  मृतक को आखिरी बार उनके साथ देखा गया, CCTV में दोनों शव को बोरी में ले जाते दिखे, शव और मोबाइल सिम की बरामदगी उनकी निशानदेही पर हुई। यानी अपराध किसने किया, यह तो पुलिस ने साबित कर दिया; पर अपराध किसने करवाया, यह साबित करने में पुलिस नाकाम रही। जांच की टूटती कड़ियों ने कथित “मुख्य साजिशकर्ता” को वह रास्ता दिया, जिससे वह कानून से बाहर निकल गया।अब सवाल सिर्फ इस बात का नहीं है कि बेटा बरी हो गया। सवाल यह है कि क्या पुलिस ने जानबूझकर कमजोर केस बनाया, या जांच में काबिलियत की ही कमी थी? अदालत का निर्णय दिखाता है कि हत्या की कितनी भी सनसनीखेज कहानी क्यों न हो, न्याय तथ्य और सबूतों से चलता है, विश्वास और अनुमान से नहीं। और जहां पुलिस जांच कमजोर हो, वहाँ सबसे बड़ा आरोपी भी आसानी से कानूनी पकड़ से बाहर हो जाता है।यह मामला पुलिस की विवेचना क्षमता पर गहरे प्रश्न छोड़ता है और यह संदेश भी कि कठिन मामलों में जल्दबाजी नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, सटीक और निर्विवाद जांच ही न्याय का रास्ता बनाती है।

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