दिल्ली की अदालतों में इन दिनों माहौल गर्म है। वकील और पुलिस आमने-सामने खड़े हैं। वजह वही पुरानी, लेकिन इस बार हालात ज्यादा बिगड़ गए हैं। अदालतों में सुनवाई के दौरान पुलिस अधिकारियों का न पहुंचना अब वकीलों के सब्र का बांध तोड़ चुका है। हाल ही में जारी सर्कुलर में साफ कहा गया था कि पुलिस को हर सुनवाई पर खुद मौजूद रहना होगा, लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली।
वकीलों का दर्द
वकीलों का कहना है कि जब पुलिस ही कोर्ट में मौजूद नहीं होती तो केस आगे कैसे बढ़ेगा? गवाहियों की रिकॉर्डिंग अटक जाती है, सबूत पेश नहीं हो पाते और इंसाफ़ महीनों नहीं बल्कि सालों तक टल जाता है।
एक वकील ने नाराज़गी जताते हुए कहा –
“हम रोज़ अपने मुवक्किल को क्या जवाब दें? हर बार कहना पड़ता है कि पुलिस नहीं आई इसलिए केस रुका। आखिर जनता कब तक इस चक्कर में पिसती रहेगी?”
पुलिस का तर्क
पुलिस भी पूरी तरह गलत नहीं है। उनका कहना है कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में हालात हर पल बदलते रहते हैं। कभी वीआईपी ड्यूटी, कभी धरना-प्रदर्शन, कभी अपराध – ऐसे में हर तारीख़ पर कोर्ट पहुंच पाना आसान नहीं है।
एक पुलिस अधिकारी ने सफाई दी –
“हम अदालत का सम्मान करते हैं, लेकिन ड्यूटी भी निभाना हमारी जिम्मेदारी है। कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि चाहकर भी कोर्ट में मौजूद नहीं हो पाते।”
जनता पिस रही बीच में
इस पूरे विवाद का सबसे ज्यादा नुकसान जनता को उठाना पड़ रहा है। सालों से केस लड़ रहे लोग उम्मीद लेकर कोर्ट आते हैं, लेकिन जब सुनवाई टल जाती है तो उनका धैर्य टूट जाता है।
एक पीड़ित परिवार ने कहा –
“हम पांच साल से इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं। हर बार तारीख़ मिलती है, लेकिन सुनवाई पूरी नहीं होती। आखिर हम कब तक इस चक्कर में फंसे रहेंगे?”
वकीलों का बड़ा कदम
वकीलों का कहना है कि उन्होंने कई बार पुलिस अधिकारियों की गैरमौजूदगी पर आपत्ति जताई, लेकिन हालात नहीं बदले। अब मजबूर होकर उन्होंने हड़ताल का एलान कर दिया है। उनका मानना है कि जब तक पुलिस वक्त पर कोर्ट में मौजूद नहीं होगी, तब तक इंसाफ़ देना सिर्फ़ एक खोखला वादा ही रहेगा।
क्या है रास्ता?
कानून के जानकारों का कहना है कि अब वक्त आ गया है कि अदालत, पुलिस और वकील मिलकर कोई बीच का हल निकालें। आज जब तकनीक इतनी आगे है तो पुलिस अधिकारियों की वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेशी भी एक विकल्प हो सकता है। इससे ड्यूटी भी निभेगी और अदालत की सुनवाई भी समय पर हो सकेगी।
नतीजा
दिल्ली की अदालतों में वकीलों और पुलिस के बीच यह खींचतान अब सिर्फ एक संस्थागत विवाद नहीं रहा, बल्कि इसका असर सीधे आम जनता पर पड़ रहा है। जो लोग इंसाफ़ के लिए सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके लिए हर टली हुई तारीख़ एक नई मायूसी लेकर आती है। अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि क्या दोनों पक्ष मिलकर कोई हल निकाल पाएंगे, ताकि जनता की तकलीफें कम हो सकें और इंसाफ़ सचमुच समय पर मिल सके।

