दिल्ली दर्पण ब्यूरो
नई दिल्ली: राजधानी का केशव पुरम जोन इन दिनों भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी का अखाड़ा बन चुका है। सावन पार्क वार्ड में नगर निगम कर्मचारी की बेरहमी से पिटाई ने यह साफ कर दिया है कि दिल्ली की सड़कों पर घूम रही आवारा गायें केवल जनता के लिए सिरदर्द नहीं हैं, बल्कि यह विभाग की ‘दूधिया कमाई’ का सबसे बड़ा सबूत हैं।
वसूली का ‘रेट’ बढ़ा तो फटा कर्मचारी का कानताजा मामला भारत नगर थाना क्षेत्र का है, जहाँ एमसीडी कर्मचारी राजू के साथ गाय पालकों ने जमकर मारपीट की। इस हमले में राजू के कान का पर्दा फट गया, जिसके बाद उसे दीपचंद बंधु अस्पताल से बड़े अस्पताल में रेफर करना पड़ा। पीड़ित कर्मचारी के अनुसार, वह वज़ीरपुर जेजे कॉलोनी के पास मरणासन्न अवस्था में पड़ी एक गाय की सूचना देने गया था, लेकिन वहां डेयरी संचालकों ने उसे घेर लिया। वहीं, डेयरी संचालकों का आरोप है कि एमसीडी कर्मचारी लगातार ‘महीना’ (रिश्वत) बढ़ाने का दबाव बना रहे थे, जिसके चलते यह विवाद खूनी संघर्ष में बदल गया।

अंधा सिस्टम : बीमार गाय दिखी, अवैध डेयरी नहीं ?दिल्ली दर्पण टीवी की ग्राउंड रिपोर्ट में सबसे बड़ा सवाल यह उठा है कि आखिर नगर निगम के अधिकारियों को मेट्रो स्टेशन की मुख्य सड़क पर खड़ी सैकड़ों आवारा गायें और अवैध डेयरियां नजर क्यों नहीं आतीं? क्या अधिकारियों की आंखों पर भ्रष्टाचार की पट्टी बंधी है? स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भी कर्मचारी कार्रवाई का नाटक करने जाते हैं, तो पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी जाती ?

पुराना है मौत का खेल
यह पहली बार नहीं है जब केशव पुरम जोन सुर्खियों में है। इससे पहले भी अवैध डेयरी संचालकों के साथ हुई मारपीट में एक निगम कर्मचारी की जान जा चुकी है। इसके बावजूद प्रशासन ‘कमीशन’ के खेल में इतना डूबा है कि उसे न तो अपने कर्मचारियों की सुरक्षा की परवाह है और न ही जनता की जान की।फिलहाल, पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है, लेकिन सवाल वही है—क्या दिल्ली की सड़कें इन आवारा गायों और भ्रष्ट अधिकारियों के नेक्सस से कभी आजाद हो पाएंगी ?
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