कभी लोग उसे “बाबा” कहकर आदर से झुकते थे, तो कभी उसके प्रवचनों में बैठकर लोग सुकून ढूंढते थे। लेकिन असलियत कुछ और ही थी। यही बाबा चैतन्यानंद जब कानून की गिरफ्त में आया, तो लोगों ने समझा कि इंसान के चेहरे पर चोला चाहे कितना भी पाक दिखे, अंदर की हकीकत बिल्कुल अलग हो सकती है।
थाने की दहलीज़ पर टूटी खामोशी
यह सब तब शुरू हुआ जब एक पीड़ित थाने की चौखट पर पहुँचा। चेहरे पर गुस्सा भी था और बेबसी भी। जैसे ही उसने शिकायत दर्ज कराई, उसके पहले ही शब्दों ने पुलिस को झकझोर दिया – “बाबा को पकड़ो, वरना वह और लोगों को भी बर्बाद कर देगा।” वह शख्स भरोसे में ठगा गया था और चाहता था कि अब कोई और इस धोखे का शिकार न बने।
भागते-भागते बदल डाले 13 होटल
शिकायत दर्ज होते ही बाबा को अंदाज़ा हो गया था कि गिरफ्तारी अब बस वक्त की बात है। लेकिन वह चतुर निकला। भागते-भागते उसने 13 अलग-अलग होटल बदले। हर होटल में उसकी पहचान अलग थी – कहीं वह साधु बनकर आया, तो कहीं व्यापारी। नकली आईडी, नकली नाम और कभी मुस्कुराकर, कभी गंभीर चेहरा बनाकर उसने होटल वालों को भी बेवकूफ बना दिया। सोचिए, एक ही शहर में कोई साधु एक रात होटल के कमरे में माला फेर रहा है और दूसरी रात किसी और होटल में “बिज़नेसमैन” बनकर चाय की चुस्कियां ले रहा है।
साधुओं के बीच घुल गया
जब होटल बदलने का खेल ज़्यादा दिन तक नहीं चला, तो उसने अगली चाल चली – साधुओं की भीड़ में घुल जाने की। मेला हो या आश्रम, जहाँ साधु-संतों की भीड़ होती, वहीँ जाकर वह बैठ जाता। हाथ में माला, माथे पर तिलक और चेहरे पर गंभीरता – मानो कोई गहरी तपस्या में लीन हो। वहां मौजूद लोग समझ भी नहीं पाते थे कि उनके बीच बैठा यह साधु असल में पुलिस से भागा हुआ एक आरोपी है।
पुलिस की जद्दोजहद
उधर, पुलिस की भी रातों की नींद उड़ चुकी थी। रोज़ नए सुराग निकलते, लेकिन बाबा हाथ नहीं आता। होटल रजिस्टर खंगाले गए, सीसीटीवी फुटेज देखे गए और मुखबिरों से खबरें जुटाई गईं। एक-एक करके 13 होटलों का पता चला, और फिर धीरे-धीरे पुलिस ने घेरा कसना शुरू किया। यह आसान नहीं था। हर खबर के साथ एक नया मोड़ आ जाता। लेकिन पुलिस ने हार नहीं मानी।
गिरफ्तारी का पल
आखिर वह दिन भी आया। पुलिस को पुख्ता खबर मिली कि बाबा साधुओं के बीच छिपा है। छापा पड़ा। अचानक भगदड़ जैसी स्थिति बन गई। साधुओं के बीच बैठा बाबा उस वक्त बिल्कुल सामान्य दिखने की कोशिश कर रहा था, लेकिन आंखों में डर साफ झलक रहा था। जैसे ही पुलिस ने उसे पकड़ा, वह हक्का-बक्का रह गया। जो शख्स महीनों तक पुलिस से खेल खेल रहा था, वह पल भर में धर लिया गया।
राहत और सबक
थाने में वापस लाया गया तो वही पीड़ित, जिसकी आवाज़ से यह कहानी शुरू हुई थी, राहत की सांस ले सका। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी – जैसे न्याय ने पहली बार उसकी तरफ हाथ बढ़ाया हो। पुलिस ने भी माना कि यह गिरफ्तारी आसान नहीं थी। लेकिन असली सबक यह है कि चोले और चमत्कारों के पीछे छिपे इंसान को पहचानना जरूरी है।
आज यह कहानी सिर्फ एक बाबा की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है। यह हमारे समाज की आंखें खोलती है। हम कितनी आसानी से लबादे और दाढ़ी देखकर किसी को संत मान बैठते हैं। जबकि हकीकत यही है कि अपराधी कभी भी किसी भी रूप में सामने आ सकता है।
निष्कर्ष
बाबा चैतन्यानंद का यह खेल आखिरकार खत्म हुआ। 13 होटल बदलकर, साधुओं के बीच घुलकर और पहचान छुपाकर उसने सोचा था कि वह कानून को मात दे देगा। लेकिन सच यही है – अपराध चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, सच और न्याय की पकड़ से बच पाना नामुमकिन है।

