Thursday, March 12, 2026
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शराब नीति मामला : दिल्ली हाई कोर्ट के नोटिस से फिर गरमाई सियासत, कानूनी प्रक्रिया या नई मुसीबत?

– दिल्ली दर्पण ब्यूरो 

नई दिल्ली: दिल्ली के बहुचर्चित शराब नीति मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा सभी आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील पर अब दिल्ली हाई कोर्ट ने अपना रुख स्पष्ट किया है। सोमवार को हाई कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित सभी 21 आरोपियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इसके साथ ही अदालत ने सीबीआई अधिकारियों पर कार्रवाई करने के निचली अदालत के निर्देश पर फिलहाल रोक लगा दी है।

कानूनी प्रक्रिया या सबूतों का संकेत?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट द्वारा नोटिस जारी करना न्यायपालिका की एक मानक प्रक्रिया (Standard Procedure) है। जब भी निचली अदालत के किसी बड़े फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जाती है, तो दूसरे पक्ष का पक्ष सुनना अनिवार्य होता है। इसे पहली नजर में ‘दोषी’ मानना या ‘नए सबूत’ मिलना नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह मामले की मेरिट पर दोबारा विचार करने की शुरुआत है।

सीबीआई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाने के पीछे तर्क यह है कि यदि मुख्य अपील पर सुनवाई लंबित है, तो जांच अधिकारियों को दंडित करना जल्दबाजी होगी।

राजनीतिक घमासान: दावों और प्रतिदावों का दौर

हाई कोर्ट के इस कदम को बीजेपी और आम आदमी पार्टी अपने-अपने राजनैतिक हितों के अनुसार परिभाषित कर रही हैं:

  • बीजेपी का रुख: भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि हाई कोर्ट द्वारा अपील को स्वीकार करना और नोटिस जारी करना इस बात का प्रमाण है कि निचली अदालत के फैसले में खामियां थीं। बीजेपी प्रवक्ताओं का दावा है कि हाई कोर्ट में ‘कट्टर ईमानदारी’ का मुखौटा उतर जाएगा।
  • आम आदमी पार्टी का पक्ष: वहीं, ‘आप’ ने इसे केवल एक अदालती प्रक्रिया बताया है। पार्टी का कहना है कि निचली अदालत ने विस्तार से सबूतों का अध्ययन करने के बाद ही सबको बरी किया था और सीबीआई की दलीलें ऊपरी अदालत में भी टिक नहीं पाएंगी।

बड़ा सवाल: क्या निचली अदालत की टिप्पणी सही थी?

कानूनी गलियारों में इस बात पर भी चर्चा है कि क्या ट्रायल कोर्ट को जांच एजेंसी के खिलाफ इतनी कड़ी टिप्पणी करनी चाहिए थी। विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे जज की निर्भीकता मानता है, जबकि दूसरा वर्ग इसे ‘अधिकार क्षेत्र से बाहर’ जाकर की गई टिप्पणी बता रहा है। अब गेंद हाई कोर्ट के पाले में है, जहां यह तय होगा कि जांच में वाकई खामियां थीं या सीबीआई के पास पर्याप्त आधार मौजूद हैं।

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