-दिल्ली दर्पण ब्यूरो| नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने भलस्वा डेयरी थाना पुलिस की कार्यप्रणाली और जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मारपीट के एक मामले में पुलिस द्वारा एक युवा छात्र, पुष्कर, को आरोपी बनाए जाने के बाद अदालत ने उसे अग्रिम जमानत दे दी है। इस आदेश से पुलिस की ‘काबिलियत’ और जांच की ‘नियत’ पर उंगलियां उठ रही हैं क्योंकि एफआईआर में नाम न होने के बावजूद पुलिस छात्र की गिरफ्तारी पर आमादा थी।
एडवोकेट श्वेता एस. कुमार की दलीलों ने पुलिस को किया निरुत्तर
अदालत में आरोपी छात्र का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता श्वेता एस. कुमार ने अपनी कानूनी काबिलियत का लोहा मनवाया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उनका मुवक्किल एक होनहार छात्र है और पुलिस की गलत कार्रवाई उसके पूरे करियर को तबाह कर सकती है।
श्वेता एस. कुमार ने सफलतापूर्वक यह साबित किया कि:
- एफआईआर के मूल विवरण में पुष्कर हमलावरों में शामिल ही नहीं था।
- पुलिस ने बिना किसी पिछले आपराधिक रिकॉर्ड के एक छात्र को सलाखों के पीछे भेजने की कोशिश की।
- शिकायतकर्ता पक्ष द्वारा लगाए गए ‘उकसाने’ के आरोप मनगढ़ंत हैं क्योंकि पुलिस रिकॉर्ड (FIR) में इनका कोई जिक्र नहीं है。
पुलिस की नाकामी: असली गुनहगार अब भी आजाद
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की पेशेवर कार्यक्षमता तब कटघरे में आ गई जब जांच अधिकारी (IO) ने कोर्ट में स्वीकार किया कि मुख्य हमलावर—हर्ष, साहिल और तरुण—अभी भी फरार हैं। यह हैरान करने वाला है कि पुलिस ने उन हमलावरों को पकड़ने के बजाय एक ऐसे युवक पर ध्यान केंद्रित किया जिसके खिलाफ मारपीट का कोई साक्ष्य नहीं था ।
न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी की आजादी को छीनने का कोई ठोस आधार नहीं है。 कोर्ट ने निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में पुष्कर को ₹10,000 के निजी मुचलके पर रिहा किया जाए।
यह फैसला पुलिस प्रशासन के लिए एक सबक है कि वे केवल अपनी फाइलों को भरने के लिए निर्दोष छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न करें।
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