यह कहानी दिल्ली की नहीं, इंसानियत की है। कभी-कभी ज़िंदगी ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहाँ पढ़ाई तो होती है, पर समझ नहीं; जहाँ इंसान के हाथों में स्टेथोस्कोप की जगह बंदूक आ जाती है। दो नौजवान — दोनों डॉक्टर। एक की नई-नई शादी हुई थी, दूसरा उसका दोस्त था। दोनों के घरवाले शायद सोच रहे होंगे कि उनके बच्चे अब ज़िंदगियाँ बचाएँगे, पर वो तो मौत बाँटने की तैयारी कर रहे थे। हरियाणा के फरीदाबाद में एक छोटा सा किराए का घर था — बाहर से बिल्कुल आम, लेकिन अंदर 350 किलो धमाका छिपा हुआ। सोचिए, 350 किलो! ये सिर्फ़ बारूद नहीं था, बल्कि किसी की नफ़रत का वज़न था। जब पुलिस पहुँची तो दरवाज़े के पीछे मौत का गोदाम खुला — AK-47, गोला-बारूद, और ऐसे रसायन जो किसी शहर को राख बना सकते थे। अगर वो एक दिन और बच जाते, तो शायद आज हम किसी और दर्दनाक सुबह की ख़बर पढ़ रहे होते।

पर सबसे डरावनी बात यह नहीं कि उन्होंने क्या किया, बल्कि यह थी कि वो डॉक्टर थे — पढ़े-लिखे, सभ्य, नम्र, ऐसे लोग जिनपर भरोसा किया जाता है। वो हंसते थे, लोगों से अच्छे से बात करते थे, पड़ोसी कहते हैं, “बहुत शरीफ़ लगते थे।” किसे पता था कि उसी मुस्कुराहट के पीछे एक साज़िश पल रही है। यह कहानी हमें एक सख़्त सवाल छोड़ जाती है — क्या डिग्री इंसानियत की गारंटी देती है? या हम सब बस दिखावे में ही सभ्य हैं और अंदर से धीरे-धीरे नफ़रत में डूब रहे हैं? पुलिस ने वक्त रहते रोक लिया, दिल्ली आज सुरक्षित है, पर डर यही है कि अगर एक डॉक्टर आतंकी बन सकता है, तो हम दूसरों को कैसे पहचानेंगे? यह कहानी बारूद की नहीं, इंसानियत के खोने की है — जहाँ “इलाज करने वाले हाथों” ने खुद दुनिया को घायल करने की कसम खा ली।

