दिल्ली… वो शहर जो कभी नहीं सोता, लेकिन हमेशा बोलता है।
कभी अपनी गलियों से, कभी अपनी दीवारों से, और कभी उन नोटिसों से जो हर कुछ महीनों में सत्ता के दरवाज़े पर दस्तक देते हैं।
इस बार चर्चा में है — “फांसी घर” विवाद।
और इस बार भी नाम वही हैं — अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया। तिहाड़ जेल प्रशासन ने शिकायत की, नोटिस गया, तारीख तय हुई — 13 नवंबर।
दोनों नेताओं से पूछताछ होगी।
पर असल सवाल ये नहीं कि पूछताछ क्यों हो रही है।
असल सवाल है — क्यों हर बार कुछ नया उनके दरवाज़े तक आ ही जाता है?
कहानी की जड़ — तिहाड़ के उस कमरे तक जाती है जहां सन्नाटा भी भारी होता है
“फांसी घर” — नाम सुनते ही एक सर्द लहर सी दौड़ जाती है।
तिहाड़ जेल की वो जगह, जहां देश के कुछ सबसे कुख्यात अपराधियों ने अपनी आखिरी सुबह देखी।
जहां हवा में मौत की चुप्पी बसी है, और दीवारों पर सैकड़ों अनकहे किस्से टंगे हैं। यहीं से शुरू हुआ यह पूरा विवाद।
जेल के अंदर उस पुराने “फांसी घर” की मरम्मत हो रही थी — और इस बीच कुछ बयान, कुछ दस्तावेज़ और कुछ टिप्पणियाँ बाहर आईं।
तिहाड़ प्रशासन को यह नागवार गुज़रा।
उन्होंने कहा — “सरकार ने हमारे काम में दखल दिया, और संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक कर दी।”
फिर क्या था — शिकायत दर्ज हुई, और अब नोटिस जारी।
नोटिस और वो तारीख — 13 नवंबर
नवंबर की ठंडी हवा में अब दिल्ली की राजनीति फिर गरम हो गई है।
13 नवंबर को केजरीवाल और सिसोदिया को जवाब देना है —
या तो खुद पेश होकर, या अपने प्रतिनिधि के ज़रिए।
पूछा जाएगा — “जानकारी बाहर कैसे गई? किसने कहा?” अभी तक केजरीवाल चुप हैं।
पर उनके करीबी कहते हैं — “ये सब बदले की राजनीति है।”
AAP के दफ्तरों में चर्चा है कि “जब भी सरकार कोई काम करती है जो आम लोगों के लिए होता है, तो विपक्ष एक नया विवाद उठा देता है।”
दिल्ली के कॉफ़ी हाउसों और नुक्कड़ों पर अब वही चर्चा चल रही है — “ये केस है या राजनीति?”
सियासत का शोर, और जनता की खामोशी
जैसे ही खबर आई, विपक्ष ने हमला बोला।
बीजेपी ने कहा — “AAP के नेताओं के लिए अब कोई मर्यादा नहीं बची। न शिक्षा, न शासन, न जेल।”
वहीं AAP के समर्थक सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं —
“जब मनीष सिसोदिया जेल में हैं, तब भी उनके नाम पर केस बढ़ रहे हैं। ये राजनीति नहीं तो क्या है?” दिल्ली की जनता अब बस देख रही है।
कभी टीवी पर, कभी ट्विटर पर —
कि आखिर कब यह शहर अपने असली मुद्दों पर लौटेगा: स्कूल, सफाई, सड़कें, और सांस लेने लायक हवा।
‘फांसी घर’ — दीवारों में छिपा सन्नाटा और डर दोनों
तिहाड़ जेल का “फांसी घर” सिर्फ एक जगह नहीं, एक एहसास है।
वो जगह जहां हर कदम भारी होता है।
जहां ज़िंदगी और मौत के बीच सिर्फ एक रस्सी का फासला होता है।
और अब वही जगह सियासत का मैदान बन गई है। जेल प्रशासन का कहना है — “यह जगह संवेदनशील है, यहां से कुछ भी बाहर नहीं जाना चाहिए।”
लेकिन राजनीति में “बाहर जाना” तो खेल का हिस्सा है।
और शायद यही बात आज के इस विवाद की जड़ है —
सत्ता की रस्सी और सच्चाई की दीवार के बीच फंसी एक कहानी।
आगे क्या होगा?
13 नवंबर को पूछताछ होगी।
हो सकता है बस एक औपचारिकता हो,
या फिर मामला और गहरा जाए — जैसे हर बार जाता है।
अगर जवाब जांच अधिकारियों को नहीं जमते, तो अगला कदम तय है।
और अगर साबित हुआ कि यह बस एक और राजनीतिक चाल है,
तो AAP इसे “राजनीतिक उत्पीड़न” बताकर और तेज़ आवाज़ में जवाब देगी। दिल्ली की राजनीति अब किसी थ्रिलर फिल्म जैसी लगने लगी है।
हर हफ्ते एक नया केस, हर महीने एक नई तारीख।
कभी तिहाड़ से खबर आती है, कभी CBI दफ्तर से, कभी विधानसभा से।
पर अंत में सवाल वही रहता है —
क्या ये सब जनता के लिए है, या सिर्फ कुर्सी के लिए?

