दिल्ली दर्पण ब्यूरो
नई दिल्ली: “शांति, सेवा, न्याय” का नारा देने वाली दिल्ली पुलिस के कुछ अधिकारी ही अब सिस्टम को ठेंगा दिखा रहे हैं। हाल ही में सामने आए दो अलग-अलग मामलों—एक में जालसाजी और दूसरे में रंगे हाथों रिश्वतखोरी—ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ये घटनाएं दर्शाती हैं कि राजधानी की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाली पुलिस के भीतर भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।
केस 1: कोर्ट में फर्जीवाड़ा और अधिकारियों के नकली साइन
द्वारका कोर्ट ने हाल ही में महिला सब-इंस्पेक्टर (SI) कविता माथुर को धोखाधड़ी और जालसाजी का दोषी करार दिया है। मामला हैरान करने वाला है क्योंकि SI ने अपने ही विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों (ACP और SHO) के फर्जी हस्ताक्षर कर चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी थी। इतना ही नहीं, मामला खुलने पर उन्होंने जांच अधिकारी को खुदकुशी की धमकी देकर डराने की भी कोशिश की। यह मामला लोक दस्तावेजों के साथ खिलवाड़ और न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने का एक खतरनाक उदाहरण है।
केस 2: थाने के भीतर से CBI की रेड और गिरफ्तारी
भ्रष्टाचार का दूसरा ताजा मामला पश्चिम विहार वेस्ट थाने से सामने आया है, जहाँ शुक्रवार शाम करीब 7 बजे CBI ने 2010 बैच के सब-इंस्पेक्टर मनोज कुमार को एक लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए थाने के अंदर से ही गिरफ्तार किया। आरोप है कि धारा 308 (गैर इरादतन हत्या का प्रयास) के एक मामले में जमानत दिलाने और मदद करने के नाम पर उसने 5 लाख रुपये मांगे थे, जिसका सौदा 3 लाख में तय हुआ। थाने के भीतर हुई इस छापेमारी ने पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है।
चिंताजनक आंकड़े: रंगे हाथों पकड़े जा रहे ‘रक्षक’
दिल्ली पुलिस में भ्रष्टाचार की स्थिति को लेकर हालिया आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं:
- CBI की सक्रियता: आधिकारिक रिपोर्ट्स और हालिया कार्रवाई के अनुसार, इस साल अब तक 20 से अधिक दिल्ली पुलिस कर्मियों को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया जा चुका है।
- बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी: पिछले साल के अंत तक (दिसंबर 2024 तक) के आंकड़ों को देखें तो केवल एक साल में लगभग 36 पुलिस अधिकारियों को CBI ने विभिन्न भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तार किया था।
- थाना स्तर पर भ्रष्टाचार: गिरफ्तार होने वालों में सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी शामिल हैं। इनमें अधिकतर मामले अवैध निर्माण, सट्टेबाजी को संरक्षण देने या आपराधिक केसों में धाराएं कम करने के बदले पैसे मांगने से जुड़े हैं।
विशेषज्ञों की राय: आखिर कहाँ है कमी?
जानकारों का मानना है कि विभागीय निगरानी (Vigilance) की कमजोरी और भ्रष्टाचार के खिलाफ त्वरित कड़ी कार्रवाई न होना ऐसे अधिकारियों का हौसला बढ़ाता है। हालांकि, ताजा मामलों में पुलिस विभाग ने तत्काल निलंबन की कार्रवाई की है, लेकिन कानून के जानकारों का कहना है कि जब तक ऐसे मामलों में सजा की दर (Conviction Rate) नहीं बढ़ेगी, तब तक खाकी पर लगने वाले इन दागों को धोना मुश्किल होगा।

