कभी सोचा है कि जिस जगह पर हम अपने बच्चों को सबसे सुरक्षित मानते हैं—वो स्कूल का गेट—वहीं उनकी जिंदगी इतनी बेरहमी से छीनी जा सकती है? दिल्ली के मंगोलपुरी में हुई ये घटना हर मां-बाप को भीतर तक हिला देगी।
सुबह का वक्त था। बाकी बच्चों की तरह वो भी स्कूल की ओर बढ़ रहा था। बैग पीठ पर टांगे, मन में शायद पढ़ाई या दोस्तों के साथ मिलने की खुशी रही होगी। लेकिन किसे पता था कि वही रास्ता उसकी जिंदगी का आख़िरी रास्ता बन जाएगा।
हादसा कैसे हुआ?
गेट पर ही कुछ लड़के खड़े थे। कहते हैं कि पहले बहस हुई, फिर अचानक बात मारपीट तक जा पहुँची। उन लड़कों ने उस मासूम पर इतने वार किए कि वो संभल ही न पाया। कुछ ही मिनटों में उसकी सांसे थम गईं।
राहगीरों ने बचाने की कोशिश की, स्कूल के लोग भी दौड़े, लेकिन देर हो चुकी थी। अस्पताल ले जाया गया, मगर डॉक्टर ने साफ कह दिया—”अब ये नहीं रहा।”
मां-बाप का टूटना
सोचिए ज़रा, जिस मां ने सुबह बेटे को प्यार से नाश्ता खिलाया होगा, उसके कपड़े ठीक किए होंगे, उसी मां को कुछ ही घंटों बाद ये खबर मिलती है कि उसका बेटा अब कभी घर नहीं लौटेगा।
पिता की आँखों से सवाल छलक रहे हैं—”आख़िर मेरे बेटे ने क्या ग़लत किया था?”
उस घर की खामोशी की कल्पना ही रोंगटे खड़े कर देती है। वो किताबें, वो कॉपी-किताब, वो बैग अब वहीं पड़े हैं, पर उनका मालिक हमेशा के लिए चला गया।
पुलिस और जांच
पुलिस का कहना है कि ये मामला आपसी रंजिश का है। आरोपियों की तलाश हो रही है। सीसीटीवी फुटेज निकाला जा रहा है। मगर असल सवाल यह है—क्या इतनी बेरहमी से एक जान लेने वाले बच्चे ही हैं, या हमारे समाज की बिगड़ती सोच भी इसका गुनहगार है?
स्कूल प्रशासन की सफाई
स्कूल का कहना है कि वारदात गेट के बाहर हुई। लेकिन लोग पूछ रहे हैं—क्या गेट के बाहर की जिम्मेदारी किसी की नहीं है? क्या सुरक्षा सिर्फ दीवार के अंदर तक सीमित है?
समाज के लिए आईना
ये सिर्फ एक बच्चा नहीं था, ये हम सबका बच्चा था। आज मंगोलपुरी में हुआ, कल कहीं और भी हो सकता है। स्कूल, जो बच्चों की सबसे सुरक्षित जगह होने चाहिए, वहां खून बह रहा है।
ये हमें सोचने पर मजबूर करता है—हम अपने बच्चों को किस तरह की दुनिया दे रहे हैं? किताबों और सपनों के बीच इतनी नफरत और हिंसा क्यों भर गई है?
अब क्या होना चाहिए?
- स्कूलों के बाहर भी पुख्ता सुरक्षा हो।
- बच्चों को सिर्फ किताबें ही नहीं, इंसानियत और गुस्से पर काबू पाना भी सिखाया जाए।
- हर परिवार को अपने बच्चों की तकलीफें और गुस्से सुनने चाहिए, वरना वो गलत रास्ता पकड़ सकते हैं।
- दोषियों को ऐसी सजा मिले कि ये घटना किसी और के साथ दोबारा न हो।
आख़िरी सवाल
मंगोलपुरी का ये बच्चा अब वापस नहीं आएगा। लेकिन उसका जाना हमें झकझोर गया है। अगर इस दर्दनाक घटना से भी हम नहीं जागे, तो अगली बार ये खबर किसी और घर के दरवाज़े पर दस्तक दे सकती है। क्या हम चाहते हैं कि हर मां को अपने बच्चे का चेहरा आख़िरी बार अस्पताल की सफेद चादर के नीचे ही दिखे?

