दिल्ली दर्पण ब्यूरो:
नई दिल्ली: दिल्ली के बाजारों में अतिक्रमण हटाने के दावे तो बहुत किए जाते हैं, लेकिन हकीकत दावों से कोसों दूर है। ताजा मामला दिल्ली के एक प्रमुख बाजार का है, जहां एक विशालकाय (भीमकाय) लोहे का कंटेनर रहस्यमयी तरीके से रातों-रात फिर से स्थापित कर दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि इस कंटेनर को कुछ समय पहले स्थानीय दुकानदारों ने अपनी जेब से 15,000 रुपये क्रेन का किराया देकर हटवाया था, क्योंकि एमसीडी (MCD) के पास इसे हटाने के संसाधन नहीं थे।
भ्रष्टाचार या लापरवाही? सवालों के घेरे में निगम
बाजार के प्रधान मनोज और स्थानीय एसोसिएशन का कहना है कि यह अवैध कंटेनर पूरी तरह से एक दुकान चलाने की योजना है। इसमें बकायदा पंखे, बिजली के बोर्ड और आधुनिक फिटिंग की गई है। हालांकि, इसे ‘चार्जिंग स्टेशन’ का नाम देकर बचाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन मौके पर मौजूद बिजली के पॉइंट्स और सेटअप कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
मुख्य बिंदु जो एमसीडी को कटघरे में खड़ा करते हैं:
- अंधेर नगरी चौपट राजा: जब निगम ने इसे एक बार अवैध मानकर हटवा दिया था, तो वही ढांचा दोबारा उसी जगह कैसे लग गया?
- जनता का पैसा, निगम की सुस्ती: स्थानीय लोगों को अपनी जेब से क्रेन बुलानी पड़ी। क्या अब दिल्ली की सड़कों से अतिक्रमण हटाने का ठेका भी जनता को ही लेना पड़ेगा?
- अधिकारियों की चुप्पी: इलाके के एलआई (LI) और संबंधित अधिकारियों का कहना है कि उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं है। दो-तीन महीने से रखे इस विशाल कंटेनर का अधिकारियों को न दिखना, मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
नेताओं के दावे बनाम धरातल की सच्चाई
स्थानीय भाजपा नेता और निगम पार्षद के प्रतिनिधि क्षेत्र में ‘जीरो टॉलरेंस’ का दम भर रहे हैं। सतीश गर्ग जैसे नेताओं का कहना है कि भाजपा किसी भी कीमत पर अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं करेगी, लेकिन जब उनसे वजीरपुर की 1200 गज की अवैध बिल्डिंग और सड़कों पर बढ़ते अतिक्रमण पर सवाल पूछा गया, तो जवाब सिर्फ “कार्यवाही होगी” तक ही सीमित रहा।
सांसद महोदय हर महीने ‘जनसुनवाई’ करते हैं और प्राथमिकता ‘अतिक्रमण’ को दी जाती है, लेकिन हकीकत में शिकायतें कम होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं। क्या ये जनसुनवाई महज एक औपचारिकता है?
बड़ा सवाल: अगर डीसी (DC) साहब के दौरे के वक्त भी अवैध निर्माण और ऐसे ‘भीमकाय कंटेनर’ सीना ताने खड़े हैं, तो क्या यह माना जाए कि एमसीडी का अमला पूरी तरह से पंगु हो चुका है या फिर ‘ऊपर तक’ हिस्सा पहुंच रहा है?

