नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट (दिल्ली दर्पण टीवी)
अभी कुछ दिन पहले दिल्ली नगर निगम के पांच अधिकारियों को भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में बर्खास्त किया गया। इसी शोर-शराबे के बीच केशवपुरम जोन के डीसी (DC) संदीप कुमार को भी उनके पद से हटाकर उनके मूल विभाग IRTC में वापस भेज दिया गया। देखने में यह कार्रवाई सख्त लग सकती है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि—क्या इतना काफी है? क्या अधिकारियों को बर्खास्त कर देना या उन्हें उनके मूल विभाग में ‘सुरक्षित’ वापस भेज देना ही न्याय है? क्या इस कागजी कार्रवाई से ऊपर बैठे आला अधिकारियों और सरकार की जिम्मेदारी और जवाबदेही खत्म हो जानी चाहिए?
सजा या ‘सेफ पैसेज’?
MCD के गलियारों में यह चर्चा आम है कि जब किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं और मामला तूल पकड़ने लगता है, तो उसे ‘डेपुटेशन’ से हटाकर वापस उसके कैडर में भेज दिया जाता है। इसे सजा कहना असल में कानून का मजाक उड़ाना है। सवाल यह उठता है कि संदीप कुमार के कार्यकाल में वजीरपुर और केशवपुरम में जो अवैध निर्माण की ‘अट्टालिकाएं’ खड़ी हुईं, जो राजस्व का करोड़ों का चूना निगम को लगा, क्या उसकी कोई रिकवरी होगी? क्या उनके खिलाफ कोई विभागीय जांच (Internal Inquiry) उनके मूल विभाग में भी चलेगी, या वे वहां जाकर फिर से ‘पाक-साफ’ हो जाएंगे?
वजीरपुर : भ्रष्टाचार का जीता-जागता ‘स्मारक’
वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया में बिना नक्शे के बेतहाशा बिल्डिंग का बनना कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रयोग था। A-91 जैसी बिल्डिंग भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर खड़ी है। स्थानीय पार्षद और जनता चिल्लाते रहे, लेकिन तत्कालीन डीसी ने बिल्डरों और रसूखदारों के साथ मिलकर कोर्ट के आदेशों तक को दरकिनार किया।
खुद डीसी साहब ने पार्षद वीना असीजा के साथ इलाके का दौरा किया था, अतिक्रमण देखा था, अवैध पार्किंग देखी थी और दिल्ली दर्पण टीवी के कैमरे पर 10 दिन में कार्रवाई का वादा किया था। आज 10 दिन बीत गए, कार्रवाई तो नहीं हुई, लेकिन साहब का ट्रांसफर जरूर हो गया। क्या यह मामले को रफा-दफा करने की कोशिश नहीं है?
‘सिस्टम फंड’ का मकड़जाल
हकीकत यह है कि निगम में भ्रष्टाचार अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि ‘संस्थागत’ हो चुका है। इलाके से होने वाली अवैध वसूली ‘सिस्टम फंड’ के नाम पर जमा होती है, जिसमें ऊपर से नीचे तक सबकी हिस्सेदारी तय है। यही वजह है कि EXN, JE और AE जैसे अधिकारी बेखौफ होकर नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं। उन्हें पता है कि अगर शोर मचा, तो ज्यादा से ज्यादा ट्रांसफर होगा या कुछ समय के लिए निलंबन।
जवाबदेही किसकी?
प्रधानमंत्री कहते हैं— “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा”। गृहमंत्री कहते हैं— “भ्रष्टाचार पर कोई समझौता नहीं होगा”। दिल्ली में बीजेपी की ‘ट्रिपल इंजन’ की सरकार के दावों के बीच निगम के अधिकारी इतने दबंग कैसे हो गए?
- क्या DC से लेकर कमिश्नर तक को इन शिकायतों की जानकारी नहीं है?
- क्या गृह मंत्रालय उन अधिकारियों की फाइलें दोबारा खोलेगा जो लूट मचाकर वापस अपने विभागों में चले गए हैं?
निष्कर्ष: अब आर-पार की जंग
पार्षद योगेश वर्मा ने सदन में विजिलेंस विभाग की ‘नींद’ पर जो सवाल उठाए हैं, वे पूरे सिस्टम पर तमाचा हैं। जब तक भ्रष्टाचार करने वाले अधिकारियों की संपत्ति कुर्क नहीं होगी और उन्हें जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा, तब तक ये बर्खास्तगी और तबादले सिर्फ एक ‘दिखावटी मरहम’ ही रहेंगे।
दिल्ली दर्पण टीवी इस भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम जारी रखेगा। अब जनता को तय करना है कि वे इस ‘लूट तंत्र’ को सहेंगे या इसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करेंगे।

