यूपी सरकार और कुछ मीडिया हाउस सोशल ट्रेड और उसके मालिक अनुभव मित्तल पर 37 करोड़ का आरोप लगाकर उसे नटवर लाल बता रही है यह हज़ारों की भीड़ उसी का जवाब है। आज़ाद भारत में शायद ऐसा पहली बार हुआ होगा की किसी कंपनी के पक्ष में निवेशक सड़कों पर उतर आये हों, लेकिन पीड़ित यानी ठगी के कथित शिकार कही नजर न आ रहे हो। ऐसे में सवाल उठाना लाज़मी है की आखिर ठगी हुयी किसके साथ है ? जिन 6.5 लाख निवेशकों के साथ ठगी का दावा पुलिस, एसटीएफ और चंद मीडिया मिलकर कर रहे हैं वे कहाँ है ?
दिल्ली के जंतर मंतर पर जमा ये हज़ारो लोग दावा कर रहे है की सोशल ट्रेड ने उनके साथ ही नहीं बल्कि किसी के साथ भी ठगी नहीं की। जिन नियमों, शर्तों एवं वायदों के आधार पर कंपनी से वे जुडे़ थे, कंपनी ने हमेशा उनका पालन किया। अनुभव मित्तल की गिरफ्तारी यूपी पुलिस और उत्तर प्रदेश के कुछ राजनेताओं और गुंडों की साजिश है जिनके आगे झुकने से कंपनी ने झुकाने से इनकार कर दिया था।
नयी दिल्ली में इन हज़ारो लोगों की तादाद, तेवर और तर्क देखकर लगता है सोशल ट्रेड पर करवाई कही सपा सरकार के ये सियासी मुसीबत न बन जाये। ये जो सवाल उठा रहे है वह सपा सरकार की नींद उड़ा सकते है।
क्या कंपनी ने निवेशकों से ठगी की ? यदि हां वे कहाँ है वे लाखों ठगी के शिकार निवेशक ? क्यों सामने आकर शिकायत नहीं दे रहे है ? जो दावा और वादा कंपनी ने निवेशकों से किया वो निभाया फिर उनके साथ ठगी कैसे हो गयी ?
क्या कंपनी फ़र्ज़ी है ?
कंपनी सरकार से पूरी तरह से रजिस्टर्ड है , देश की सुरक्षा, संप्रभुता अथवा सम्मान के विरूद्ध को काम नहीं कर रही है , सभी तरह भुगतान ऑनलाइन कर रही है जिसमें पैन कार्ड की जरूर होती है , सब कुछ सरकार की जानकारी में हो रहा था तो कंपनी तो फ़र्ज़ी कैसे हो गयी ?
क्या सरकार के साथ ठगी हुयी ?
कंपनी सभी तरह के टेक्स दे रही है , टीडीएस, सर्विस टेक्स , दे रही है तो फिर सरकार के साथ ठगी कैसे कैसे हुयी ?
सोशल ट्रेड पर आरोप है की वह पेज लाइक कराने के नाम पर ठगी कर रही थी। जबकि सोशल ट्रेड निवेशकों का कहना है कि अधिकतर निवेशक अपनी वेबसाईट, ब्लॉग अथवा अपने प्रोडेक्ट को लाइक करवाते थे न कि अपने फेसबुक खातों को। इन निवेशकों का कहना है की यदि कंपनी एक क्लिक के बदले 5 रुपये निवेशकों को दे रही थी , लाखों लोगों को रोजगार दे रही थी तो थी तो सपा सरकार के पेट में दर्ज क्यों हुआ। यदि कहीं कुछ गलत लग भी रहा था तो गिरफ्तारी से पहले पूरी जाँच होनी चाहिए थी जो नहीं हुयी। यूपी पुलिस ने अपने ही विभाग के एक कर्मचारी को शिकायतकर्ता बनाकर करवाई कर डाली और कंपनी के खिलाफ साजिश रची।
एक तरफ सरकार डिजिटल कर देने का ढोल पीट रही है तो वहीँ डिजिटल माध्यम से सेवाओं अथवा उत्पाद का प्रचार करने वाले कारोबार करने वालों को हतोत्साहित कर रही है। इन हज़ारों निवेशक प्रदर्शन कारियों ने इस मामले में ईमानदारी से जांच करने की मांग करते हुए चेतावनी दी है की यदि सोशल ट्रेड के साथ न्याय नहीं किया तो ये जेल भरो आंदोलन करेंगे , देशभर में रक्तदान करेंगे। कंपनी से जुड़े कुछ लोगों का आरोप है की कंपनी से पैसे की मांग की गयी थी लेकिन कंपनी ने यह कहते हुए इनकार कर दिया की वह कोइ गलत काम नहीं रही है तो पैसे क्यों दे। लेकिन यूपी सरकार ने कंपनी को फ़र्ज़ी बताते हुए न केवल मुकदमा दर्ज किया बल्कि जाँच को पूरी करने से ज्यादा दिलचस्पी कंपनी और उसके अधिकारियों पर करवाई करने में दिखाई। हैरत की बात है की देश भर में कितनी ही बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां खुले आम अवैध काम कर रही है लेकिन उस पर कोइ करवाई नही हो रही है। ऐसे इन लोगों के इन आरोपों और चर्चों में भी दम है की अनुभव मित्तल को केवल पैसे की डिमांड पूरी न करने की ही सजा नही मिली बल्कि बीजेपी के बड़े नेताओं से नजदीकियों की की भी सजा मिली है।
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