– राजेंद्र स्वामी , दिल्ली दर्पण ब्यूरो
दिल्ली में मजदूरों की जान कितनी सस्ती है, इसका ताज़ा और दिल दहला देने वाला उदाहरण अशोक विहार फेज़-2 से सामने आया है। मंगलवार की देर रात पौने बारह बजे सीवर सफाई के दौरान डीडीए ठेकेदार की कथित आपराधिक लापरवाही ने चार मजदूरों को मौत के मुंह में धकेल दिया। इनमें से एक की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि तीन ICU में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं।
घटना स्वाभिमान अपार्टमेंट के पास हुई, जहां डीडीए की नई डलवाई गई सीवर लाइन कुछ ही दिनों में पूरी तरह जाम हो गई थी। अपार्टमेंट निवासियों की शिकायत के बाद ठेकेदार कंपनी बृजगोपाल कंस्ट्रक्शन के मैनेजर ने मजदूरों को रात के समय सीवर में उतार दिया। हैरानी की बात यह रही कि उन्हें कोई सुरक्षा उपकरण, मास्क या ऑक्सीजन सिलेंडर तक नहीं दिया गया और न ही किसी तकनीकी अधिकारी की मौजूदगी सुनिश्चित की गई। नतीजा यह हुआ कि जैसे ही मजदूर अंदर उतरे, दम घुटने लगा और वे एक-एक कर बेहोश होकर फंस गए।
इस हादसे में 40 वर्षीय अरविंद, निवासी कासगंज, यूपी, को डॉक्टरों ने अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत घोषित कर दिया। जबकि सोनू और नारायण, दोनों कासगंज निवासी, और नरेश, निवासी बिहार, ICU में भर्ती हैं और उनकी हालत नाजुक बताई जा रही है। घटना के वक्त ठेकेदार कंपनी के कर्मचारी खुद असहाय खड़े रहे और मजदूरों को बाहर निकालने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। इसी बीच वहां से गुजर रहे एक डिलीवरी बॉय ने साहस दिखाया और सीवर में उतरकर मजदूरों को बाहर निकाला। उसकी बहादुरी से तीन मजदूरों की जान बच सकी, वरना यह त्रासदी और भी बड़ी हो सकती थी।

घायल मजदूर ने होश में आने के बाद बताया कि उन्हें कहा गया था कि बस नीचे उतरकर गंदगी निकाल दो। कोई मास्क नहीं दिया गया और ना ही ऑक्सीजन सिलेंडर। जैसे ही अंदर उतरे, सांस रुकने लगी और वे बेहोश हो गए। मृतक अरविंद के भाई ने आरोप लगाया कि हमारे भाई को लालच देकर सीवर में उतारा गया, बिना सुरक्षा और बिना मेडिकल जांच। यह सीधी हत्या है और ठेकेदार को सख्त सज़ा मिलनी चाहिए।
पुलिस ने मामले में धारा 106(1)/289/337 BNS और मैनुअल स्कैवेंजर्स प्रोहिबिशन एंड रिहैबिलिटेशन एक्ट 2013 की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। क्राइम टीम ने घटनास्थल का मुआयना किया और ठेकेदार कंपनी के मैनेजर से पूछताछ की जा रही है। इस एक्ट के तहत बिना सुरक्षा उपकरण किसी को सीवर में उतारना अपराध है और पहली बार अपराध करने पर दो साल तक की कैद और दो लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है, जबकि दोबारा अपराध करने पर पांच साल तक की कैद और पांच लाख रुपये जुर्माने तक का प्रावधान है।
कानूनन फर्क साफ है कि लापरवाही तब होती है जब अनजाने में नुकसान हो, जबकि हत्या तब बनती है जब किसी को पहले से पता हो कि उसका काम मौत का कारण बनेगा, फिर भी वह जानबूझकर करता है। अशोक विहार हादसे में ठेकेदार को मालूम था कि सीवर गैस से भरे हैं और मजदूर बिना सुरक्षा उपकरण उतरे तो दम घुटकर मर सकते हैं। इसके बावजूद मजदूरों को लालच देकर उतारा गया। यानी यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि पूर्व-ज्ञान के साथ की गई आपराधिक हरकत है, जिसे हत्या का मामला माना जाना चाहिए।
राजधानी दिल्ली में हर साल ऐसे हादसों में मजदूर अपनी जान गंवाते हैं और हर बार जिम्मेदारों पर केवल लापरवाही की धाराएँ लगाकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में साफ कहा था कि सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई में मौत होने पर 10 लाख रुपये मुआवज़ा और आपराधिक कार्रवाई अनिवार्य है। इसके बावजूद हालात जस के तस हैं। सवाल साफ है कि दिल्ली में मजदूरों की जान आखिर इतनी सस्ती क्यों है और कब तक डीडीए और ठेकेदारों की इस आपराधिक लापरवाही को महज ‘लापरवाही’ कहकर टाला जाता रहेगा।

