Wednesday, May 27, 2026
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“मोदी सरकार की नीतियों से घट रहा भरोसा? पूर्व आर्थिक सलाहकारों की बड़ी चेतावनी”

कभी मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के सबसे मुखर समर्थकों में गिने जाने वाले अर्थशास्त्री अब उसी सरकार की आलोचना करते दिखाई दे रहे हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य सुरजीत भल्ला और पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने हाल के लेखों में भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

सुरजीत भल्ला, जो सितंबर 2017 से दिसंबर 2018 तक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद में रहे, कभी मोदी सरकार की आर्थिक उपलब्धियों के प्रबल पक्षधर माने जाते थे। 2018 में उन्होंने मोदी सरकार के शुरुआती चार वर्षों को भारतीय अर्थव्यवस्था के “सबसे अच्छे वर्ष” बताया था। लेकिन अब उनका रुख बदला हुआ दिखाई दे रहा है।

21 मई को इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख “बीजेपी चुनाव जीत रही है लेकिन अर्थव्यवस्था हार रही है” में भल्ला ने सरकार की आर्थिक नीतियों की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी की राजनीतिक सफलता ऐतिहासिक है, लेकिन दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में है।

भल्ला के अनुसार आर्थिक अव्यवस्था के लिए चार बड़े कारण ज़िम्मेदार हैं—सरकार, बड़े उद्योग समूह, कमजोर विपक्ष और तथाकथित “डीप स्टेट”। उनका कहना है कि सरकार समस्याओं को पहचानती तो है, लेकिन उनकी ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से बचती है।

उन्होंने भारत की विकास दर को लेकर भी सवाल उठाए। भल्ला के मुताबिक, सरकार भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताती है, लेकिन 2014 के बाद जीडीपी वृद्धि के आधार पर भारत दुनिया में नौवें स्थान पर रहा। प्रति व्यक्ति आय वृद्धि के मामले में भी भारत कई देशों से पीछे है।

भल्ला ने बांग्लादेश का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिकी डॉलर के आधार पर प्रति व्यक्ति आय वृद्धि में बांग्लादेश पहले स्थान पर रहा, जबकि भारत 16वें नंबर पर है। उनका कहना है कि अब भारत को “दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था” कहना बंद कर देना चाहिए।

उन्होंने रुपये की गिरावट पर भी चिंता जताई। पिछले एक वर्ष में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 12 प्रतिशत कमजोर हुआ है और लगातार सातवें वर्ष गिरावट दर्ज की गई है। भल्ला ने इसे अर्थव्यवस्था के भीतर मौजूद विरोधाभासों का संकेत बताया।

इस लेख पर प्रतिक्रिया देते हुए भूटान के वरिष्ठ पत्रकार तेनज़िंग लामसांग ने कहा कि अगर सुरजीत भल्ला जैसे लंबे समय तक सरकार का बचाव करने वाले अर्थशास्त्री अब हालात को गंभीर बता रहे हैं, तो इसका मतलब है कि स्थिति वास्तव में चिंताजनक हो सकती है।

सिर्फ सुरजीत भल्ला ही नहीं, बल्कि मोदी सरकार में 2014 से 2018 तक मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने भी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठाए हैं।

26 मई को इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने लेख में सुब्रमण्यम ने लिखा कि रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और देश गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि संकट की जिम्मेदारी किसके हाथ में है। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में देश को ऐसे विश्वसनीय नेतृत्व की जरूरत है जो बाजार और जनता में भरोसा पैदा कर सके।

सुब्रमण्यम के अनुसार, रुपये का संकट केवल वैश्विक परिस्थितियों या ऊर्जा आयात पर निर्भरता का नतीजा नहीं है, बल्कि यह भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक संभावनाओं को लेकर बढ़ते अविश्वास का संकेत भी है। उन्होंने दावा किया कि 2022 से फरवरी 2026 के बीच रुपया 20 प्रतिशत से अधिक कमजोर हुआ, जबकि आरबीआई के भारी हस्तक्षेप के बावजूद स्थिति नहीं सुधरी।

उन्होंने निजी निवेश में गिरावट को भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या बताया। उनके मुताबिक, 2000 के शुरुआती वर्षों में निजी कॉर्पोरेट निवेश जीडीपी के लगभग 17 प्रतिशत तक पहुंच गया था, लेकिन अब यह लगभग आधा रह गया है।

सुब्रमण्यम ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार की नीतियों का लाभ कुछ बड़े कॉर्पोरेट घरानों तक सीमित रहा, जबकि अन्य घरेलू और विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ।

उधर, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने भी सरकार की आर्थिक दिशा पर चिंता जताई है।

24 मई को न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख में बारू ने कहा कि आज निवेशकों के बीच भरोसे की कमी दिखाई दे रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि मीडिया अच्छी खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है, जबकि नकारात्मक संकेतों को दबाया जा रहा है।

बारू ने याद दिलाया कि 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2020 तक भारत को पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा था, जिसे बाद में आगे बढ़ाया गया और फिर चर्चा से ही गायब हो गया।

उनके मुताबिक, 2026 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार अभी चार ट्रिलियन डॉलर से थोड़ा अधिक है। उन्होंने सवाल उठाया कि 1990 से 2010 के बीच जो तेज़ विकास दर दिखाई दी, वह पिछले एक दशक में क्यों कायम नहीं रह सकी।

इन लगातार आलोचनाओं ने यह बहस तेज़ कर दी है कि क्या भारत की आर्थिक चुनौतियाँ केवल वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम हैं या फिर घरेलू नीतियों और निर्णयों की भी बड़ी भूमिका है।

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