– दिल्ली दर्पण ब्यूरो
नई दिल्ली कहते हैं ‘चिराग तले अंधेरा’ होता है, लेकिन केशव पुरम जोन में तो चिराग के नीचे ही पूरा ‘तबेला’ बसा दिया गया है। जिस एमसीडी दफ्तर से पूरे इलाके के अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर डंडा चलता है, उसी दफ्तर की चारदीवारी के भीतर अधिकारियों की नाक के नीचे सरकारी ‘ग्रीन बेल्ट’ को नेताओं की निजी डेयरी में तब्दील कर दिया गया है। ताज्जुब की बात यह है कि जहाँ निगम के बड़े अधिकारियों के नाम और पद की पट्टियाँ शान से लगी हैं, ठीक उसी के नीचे गायें जुगाली कर रही हैं और सरकारी जमीन पर गोबर के ढेर लगे हैं।
तस्वीरों और जीपीएस डेटा (Block C1) ने इस काली करतूत की पोल खोल दी है, जिससे साफ है कि यह कब्जा कोई रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि अधिकारियों की ‘मूक सहमति’ से सालों से फल-फूल रहा है। शिकायतकर्ता रमेश कर्दम का आरोप सीधा और तीखा है—यह डेयरी किसी आम आदमी की नहीं, बल्कि एक रसूखदार बीजेपी नेता की है। शायद यही वजह है कि जब साधारण जनता के मकानों पर निगम का बुलडोजर गरजता है, तो इस अवैध डेयरी के पास आकर उसका पेट्रोल खत्म हो जाता है। चर्चा तो यहाँ तक है कि इस डेयरी का ‘शुद्ध दूध और घी’ सीधे साहबों की रसोई तक पहुँच रहा है, जिसके बदले में सारे नियम-कानूनों को ताक पर रख दिया गया है।

हैरानी की बात यह है कि ग्रीन बेल्ट की इस जमीन पर न सिर्फ पशु बंधे हैं, बल्कि मजदूरों के रहने के लिए पक्के कमरे तक बना लिए गए हैं। रमेश कर्दम ने उपराज्यपाल से लेकर मेयर और आयुक्त तक को सबूतों के साथ चिट्ठियां लिखी, लेकिन लगता है कि पूरा सिस्टम इस फाइल पर कुंडली मारकर बैठा है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और सरकारी जमीन ‘नेताओं की जागीर’ बन जाए, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? क्या निगम के आला अफसर इस ‘दूधिया रसूख’ के आगे घुटने टेक चुके हैं या फिर किसी बड़े एक्शन का इंतज़ार है ?
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