Sunday, February 8, 2026
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भ्रष्टाचार के ‘पहाड़’ पर खड़ी दिल्ली : 12,300 टन कचरे का काला सच, शून्य प्रबंधन नीति हुई फेल

-दिल्ली दर्पण ब्यूरो ,

 नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में कचरा प्रबंधन अब केवल एक नागरिक सुविधा नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का एक बड़ा सिंडिकेट बन चुका है। दिल्ली नगर निगम (MCD) और सरकार की तमाम ‘शून्य कचरा प्रबंधन’ (Zero Waste Management) नीतियां अरबों रुपये डकारने के बाद भी धरातल पर शून्य ही साबित हुई हैं। आगामी 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले नए सख्त नियमों से पहले दिल्ली की स्थिति यह है कि शहर कचरे के ढेर पर बैठा है और जिम्मेदार अधिकारी फाइलों में ‘स्वच्छता’ का खेल खेल रहे हैं।

1. आंकड़ों का मकड़जाल और जमीनी हकीकत

दिल्ली रोजाना औसतन 12,300 टन कचरा पैदा करती है। नगर निगम के आंकड़ों के मुताबिक:

  • सूखा कचरा: 7,435 टन (प्लास्टिक, लोहा, कागज आदि)
  • गीला कचरा: 4,957 टन (जैविक कचरा) नियमों के मुताबिक, इसे घरों के स्तर पर ही अलग किया जाना चाहिए था, लेकिन दिल्ली के 250 वार्डों में से केवल 12 वार्ड (NDMC क्षेत्र) ही इस मॉडल पर काम कर पा रहे हैं। एमसीडी के वार्डों में पृथक्करण (Segregation) की दर कागजों पर तो ऊंची है, लेकिन हकीकत में सारा कचरा मिलाकर लैंडफिल पर भेजा जा रहा है।

2. भ्रष्टाचार के ‘पॉकेट एरिया’ : लैंडफिल साइटों का खेल

दिल्ली के तीन मुख्य लैंडफिल—गाजीपुर, भलस्वा और ओखला—भ्रष्टाचार के केंद्र बन गए हैं। यहां कचरा निस्तारण के बजाय ‘वजन का खेल’ (Tipping Fee Scam) चल रहा है।

  • वजन में हेराफेरी: ठेकेदारों को लैंडफिल पर लाए गए कचरे के वजन के आधार पर भुगतान किया जाता है। आरोप है कि वजन बढ़ाने के लिए कचरे में जानबूझकर मिट्टी और कंस्ट्रक्शन मलबे की मिलावट की जाती है।
  • वेस्ट-टू-एनर्जी का छलावा: अरबों की लागत से बने प्लांट बिना छंटाई वाले कचरे के कारण बार-बार खराब हो रहे हैं, जिससे न बिजली बन पा रही है और न ही कचरा कम हो रहा है।

3. ‘अगस्त क्रांति’ और खोखले वादे

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने एक साल के कार्यकाल में ‘अगस्त क्रांति’ अभियान के जरिए कूड़े से आजादी का संकल्प लिया था। खुद मुख्यमंत्री ने झाड़ू उठाकर फोटो खिंचवाई और जनता को इनाम देने का लालच भी दिया, लेकिन यह मुहिम केवल इवेंट मैनेजमेंट बनकर रह गई। पॉश ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों से लेकर पुनर्वास कॉलोनियों तक, घर-घर से कूड़ा उठाने वाले वाहनों में आज भी मिक्स कचरा ही लदा दिखाई देता है।

4. डस्टबिन घोटाला और नीतिगत नाकामी

दिल्ली में 2016 के उपनियमों के तहत करोड़ों की लागत से हरे और नीले रंग के डस्टबिन खरीदे गए। नेताओं ने वोट बैंक की खातिर इन्हें बांटा तो सही, लेकिन जनता में जागरूकता फैलाने का कोई प्रयास नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि अधिकांश डस्टबिन या तो चोरी हो गए या फिर उनका उपयोग कचरा निस्तारण के बजाय अन्य कार्यों में होने लगा। यह सीधे तौर पर सरकारी धन की बर्बादी और नीतिगत भ्रष्टाचार का उदाहरण है।

5. 1 अप्रैल से नई चुनौती : क्या बदलेगा?

नए ठोस कचरा प्रबंधन नियमों के तहत अब चार तरह के कचरे की छंटाई अनिवार्य होगी। जानकारों का कहना है कि जब तंत्र दो तरह के कचरे को अलग करने में विफल रहा, तो चार श्रेणियों का प्रबंधन कैसे होगा? बिना किसी ठोस इच्छाशक्ति और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के, ये नए नियम भी पिछली योजनाओं की तरह भ्रष्टाचार की नई राह ही खोलेंगे।

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