– दिल्ली दर्पण ब्यूरो
चरण सिंह राजपूत
भारत और अमेरिका के बीच होने वाले द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) को लेकर देश के किसान संगठनों में भारी आक्रोश है। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) का आरोप है कि इस डील के तहत भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क (टैरिफ) को 150% से घटाकर शून्य करने पर सहमति जताई है, जबकि अमेरिका भारतीय उत्पादों पर 18% तक का भारी टैरिफ लगाएगा। किसानों का मानना है कि यह समझौता भारतीय कृषि बाजार को बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के लिए खोलने जैसा है, जिससे देश की खाद्य संप्रभुता और आत्मनिर्भरता खतरे में पड़ जाएगी।
इस डील के विरोध में किसानों ने सीधे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को खुला पत्र भेजकर हस्तक्षेप की मांग शुरू कर दी है। पत्र में प्रधानमंत्री को इस “खतरनाक” समझौते पर हस्ताक्षर न करने का निर्देश देने, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल को बर्खास्त करने और वित्त मंत्री द्वारा धान व गेहूं पर दिए जा रहे बोनस को रोकने वाले पत्र को वापस लेने की अपील की गई है। किसानों का तर्क है कि अमेरिका में एक औसत किसान को सालाना 21 लाख रुपये से अधिक की सब्सिडी मिलती है, जबकि भारतीय किसान नकारात्मक सब्सिडी और बढ़ती लागत से जूझ रहा है। ऐसे में बिना सुरक्षा कवच के बाजार खोलना देश के 11 करोड़ किसान परिवारों के लिए आत्मघाती होगा।

आंदोलन की भविष्य की रणनीति तय करने के लिए 24 फरवरी को कुरुक्षेत्र के जाट भवन में संयुक्त किसान मोर्चा की जनरल बॉडी की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में देशव्यापी आंदोलन का बड़ा ऐलान होने की संभावना है। किसान संगठनों ने योजना बनाई है कि इस विरोध को गांव-गांव तक ले जाया जाए, जहां ग्रामीण जनसभाएं की जाएंगी और डाकघरों के माध्यम से राष्ट्रपति भवन तक विरोध पत्र पहुंचाए जाएंगे। सेब, डेयरी, कपास, मक्का और सोयाबीन उत्पादक किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने अमेरिकी दबाव के आगे घुटने टेके, तो वे सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होंगे।
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