- राजेंद्र स्वामी, दिल्ली दर्पण ब्यूरो
नई दिल्ली: देश का सिस्टम जब रसूखदारों के आगे नतमस्तक हो जाए, तो ‘मदर्स प्राइड’ स्कूल के कर्ता-धर्ता देवेंद्र गुप्ता और उनकी पत्नी सुधा गुप्ता जैसे चेहरे सामने आते हैं। कहने को तो ये शिक्षा का मंदिर चलाते हैं, लेकिन असलियत में इनके कारनामे किसी शातिर अपराधी से कम नहीं। दिल्ली, हरियाणा और यूपी में धोखाधड़ी की 28 FIR दर्ज होने के बावजूद—जिनमें CBI और ED जैसी एजेंसियां शामिल हैं—ये ठग आज भी सलाखों के पीछे होने के बजाय खुलेआम घूम रहे हैं। सवाल यह है कि हज़ारों करोड़ डकारने वाले इन अपराधियों ने आज तक कोर्ट की दहलीज पर कदम क्यों नहीं रखा ? क्या हमारा कानून सिर्फ गरीबों के लिए है?

पोंजी स्कीम का ‘खूनी’ जाल और EOW की ‘रहस्यमयी’ सुस्ती
मदर्स प्राइड और प्रेसिडियम के मालिकों ने केवल स्कूल नहीं चलाए, बल्कि अभिभावकों के भरोसे की लाश पर अपना साम्राज्य खड़ा किया। पोंजी स्कीम के जरिए “बेहतर रिटर्न” और “फीस में छूट” का ऐसा मायाजाल बुना गया कि हज़ारों लोगों की जमा-पूंजी देखते ही देखते गायब हो गई।
अब जबकि दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने 2019 की FIR पर चार्जशीट दाखिल की है, तो जांच पर ही गंभीर सवाल उठ रहे हैं। 4.15 करोड़ की ठगी के इस मामले में चार्जशीट तक पहुँचने में 10 साल कैसे लग गए? क्या यह देरी इसलिए की गई ताकि ये ‘सफेदपोश’ ठग अपनी अवैध संपत्तियां सुरक्षित कर सकें? चार्जशीट में ‘मनी ट्रेल’ और साजिश की कड़ियों को इतना ढीला छोड़ना साफ इशारा करता है कि सिस्टम इन्हें “सेफ पैसेज” देने की फिराक में है।
MCD के सस्पेंडेड JE से ‘शिक्षा टाइकून’ तक का सफर
शिक्षा जगत का यह ‘नटवरलाल’ देवेंद्र गुप्ता, साल 1999 में दिल्ली नगर निगम में जूनियर इंजीनियर के पद से सस्पेंड हुआ था। 26 साल से CBI का केस चल रहा है, लेकिन सिस्टम की मेहरबानी देखिए कि यह शख्स देखते ही देखते करोड़ों का ‘टाइकून’ बन गया। ‘मदर्स प्राइड’ और ‘प्रेसिडियम’ के ब्रांड का इस्तेमाल लोगों को लूटने के लिए किया गया।
आज जब पीड़ित इंसाफ के लिए दर-दर भटक रहे हैं, यह परिवार द्वारका समालखा रोड पर 500 करोड़ के आलीशान फार्म हाउस में मर्सिडीज और रॉयल जैसी लग्जरी गाड़ियों के काफिले के साथ ऐश कर रहा है। जबकि इनकी जगह कोई आम आदमी होता और उस पर छोटी मोटी ठगी के आरोप होते तो वह ना केवल जेल यात्रा कर चुका होता बल्कि अदालतों के भी चक्कर लगा रहा होता।

क्या अगले ‘विजय माल्या’ की तैयारी है?
सूत्रों के अनुसार, अब यह परिवार अपनी लूटी हुई काली कमाई को दुबई में निवेश कर रहा है। वहां स्कूल-कॉलेज बनाने के नाम पर भागने की ज़मीन तैयार की जा रही है। अंदेशा साफ है—अब जब चार्जशीट का फंदा गले तक पहुँचने लगा है, तो ये लोग नीरव मोदी और विजय माल्या की तर्ज़ पर देश छोड़ने की फिराक में हैं।
निष्कर्ष: पाप का घड़ा और सोता हुआ प्रशासन
इनके द्वारा ठगी शिकार लोगों की संख्या भी एक हज़ारों में है , लेकिन इनके खिलाफ लड़ने की हिम्मत दिखने वाली महज कुछ दर्जन भी लोग ही कानूनी लड़ाई लड़ रहे है। ऐसे ही पीड़ित बुजुर्ग प्रवीण जैन की वकील बुजुर्ग वकील श्वेता एस. कुमार जैसी पीड़ितों को आज भी उम्मीद है कि अगर जनता जाग गई, तो सिस्टम की ये मेहरबानियां खत्म हो सकती है । लेकिन बड़ा सवाल अदालतों और प्रशासन के सामने है: क्या आप किसी और ‘भगोड़े’ का इंतज़ार कर रहे हैं? क्या इन सफेदपोश ठगों को मासूमों की गाढ़ी कमाई पर ऐश करने की छूट यूं ही मिलती रहेगी?
अब समय आ गया है कि अदालतों की शक्ति कागजों से निकलकर इन आलीशान फार्म हाउसों तक पहुँचे, वरना जनता का न्याय व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह उठ जाएगा।

