नई दिल्ली: भारत देश तकनीकी और आधुनिकता के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद दहेज कुरुप्रथा जैसी सामाजिक बुराई आज भी पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पाई है। राजधानी दिल्ली समेत देश के कई बड़े हिस्सों में दहेज को लेकर बहुओं को प्रताड़ित किए जाने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
आरोप है कि शादी के कुछ समय बाद ही कई ससुराल वाले दहेज की अतिरिक्त मांग करने लगते हैं। मांग पूरी न होने पर महिलाओं को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। कई मामलों में घरेलू हिंसा और मानसिक दबाव जैसी गंभीर समस्याएं भी सामने आती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि दहेज की यह कुरीति केवल छोटे परिवारों तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े- बड़े और संपन्न घरों में भी बहुओं को दहेज के नाम पर परेशान व मारपीट की जाती है।
मई 2026 में चर्चा में आए Twisha और दीपिका नागर जैसे मामलों ने एक बार फिर इस गंभीर सामाजिक समस्या को उजागर किया। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि शिक्षा और आधुनिक सोच के दावों के बावजूद समाज का एक हिस्सा आज भी पुरानी संकीर्ण मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है।
कानून की नजर में दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं, लेकिन इसके बावजूद यह कुप्रथा समाज में जड़ें जमाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों की सोच और सामाजिक मानसिकता में बदलाव लाना भी बेहद जरूरी है।
समाज के जानकारों का कहना है कि जब तक लोग दहेज जैसी कुरीतियों के खिलाफ खुलकर आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक इस समस्या को पूरी तरह खत्म करना मुश्किल रहेगा।

