Monday, February 16, 2026
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“धर्म के नाम पर हिंसा नहीं”: बांग्लादेश लिंचिंग पर चीफ इमाम इलियासी की कड़ी प्रतिक्रिया

बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा की गई निर्मम हत्या ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है। इस जघन्य घटना को लेकर देश-विदेश में आक्रोश है। ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के चीफ इमाम डॉ. इमाम उमर अहमद इलियासी ने इस वारदात पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “इंसानियत को शर्मसार करने वाला अपराध” बताया है।

डॉ. इलियासी ने कहा कि जिस बर्बरता के साथ एक मासूम युवक की जान ली गई, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है। उन्होंने दुख जताते हुए कहा, “यह बेहद अफसोसनाक है। जिस तरह से उस बच्चे की हत्या की गई और फिर उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया है। यह इंसानियत का कत्ल है।” उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर लगातार हो रहे हमलों पर गहरी चिंता जताई।

उन्होंने बांग्लादेशी समाज से भी सवाल पूछे। डॉ. इलियासी ने कहा कि भारत ने हमेशा बांग्लादेश का साथ दिया—चाहे बुनियादी ढांचा हो या आर्थिक मदद—फिर भी वहां अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार बेहद पीड़ादायक हैं। उनके शब्दों में, “क्या बांग्लादेशी यह भूल गए हैं कि भारत हर मुश्किल घड़ी में उनके साथ खड़ा रहा?”

मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी पर सवाल
चीफ इमाम ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और मुस्लिम संगठनों की खामोशी पर भी तीखा सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “कहां हैं वे संगठन जो मानवाधिकारों की बात करते हैं? आज जब इतनी बर्बरता के साथ हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है, तब उनकी आवाज़ क्यों नहीं सुनाई दे रही?”

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) से बांग्लादेश में तत्काल हस्तक्षेप की अपील की। इस्लाम की शिक्षाओं का हवाला देते हुए डॉ. इलियासी ने कहा कि इस्लाम जीवन की रक्षा, क्षमा और करुणा का संदेश देता है, न कि हिंसा का। “जो लोग इस तरह की हिंसा कर रहे हैं, वे इस्लाम के सिद्धांतों का पालन नहीं कर सकते,” उन्होंने कहा।

भारत सरकार से हस्तक्षेप की मांग
डॉ. इलियासी ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से भी अपील की कि वे इस मामले में तुरंत हस्तक्षेप करें, ताकि बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों को रोका जा सके और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित हो।

यह घटना एक बार फिर दुनिया के सामने यह सवाल खड़ा करती है कि क्या मानवता, धर्म और मानवाधिकारों के नाम पर किए जाने वाले वादे केवल शब्दों तक सीमित रह गए हैं।

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