Friday, May 15, 2026
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जमानत खारिज पर उमर खालिद के पिता का बयान सामने आया, जानिए क्या कहा

नई दिल्ली।
दिल्ली दंगों की कथित साजिश से जुड़े बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अहम फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं, जबकि इसी केस में नामजद अन्य पांच आरोपियों को सशर्त जमानत दे दी गई है। कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।

उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने पर उनके पिता एस.क्यू.आर. इलियास की पहली प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने फैसले पर कोई विस्तृत टिप्पणी करने से इनकार करते हुए सिर्फ इतना कहा, “मुझे कुछ नहीं कहना है, फैसला आपके सामने है।” उनके इस संक्षिप्त बयान को फैसले के प्रति असहमति और निराशा के रूप में देखा जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है, इसलिए इस स्तर पर उन्हें जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दोनों आरोपी एक वर्ष तक इस मामले में दोबारा जमानत याचिका दाखिल नहीं कर सकेंगे

हालांकि, कोर्ट ने इसी मामले में आरोपी गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत देते हुए 12 सख्त शर्तों के साथ जमानत प्रदान की है। अदालत का कहना था कि इन आरोपियों की भूमिका और उनके खिलाफ उपलब्ध सामग्री को देखते हुए उन्हें सशर्त राहत दी जा सकती है।

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि यदि एक साल के भीतर ट्रायल के दौरान गवाहों की गवाही पूरी नहीं होती, तो उमर खालिद और शरजील इमाम निचली अदालत में दोबारा जमानत याचिका दाखिल कर सकते हैं। यह टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया में देरी को लेकर अदालत की चिंता को भी दर्शाती है।

गौरतलब है कि इससे पहले 10 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों और दिल्ली पुलिस की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। दिल्ली पुलिस ने अदालत में दलील दी थी कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा है, जबकि बचाव पक्ष ने आरोपों को राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया था।

इससे पहले उमर खालिद को अपनी बहन के निकाह में शामिल होने के लिए कड़कड़डूमा कोर्ट से 16 दिसंबर से 29 दिसंबर तक अंतरिम जमानत मिली थी। इस दौरान अदालत ने कई सख्त शर्तें लगाई थीं। अंतरिम रिहाई की अवधि में उमर खालिद को सोशल मीडिया के उपयोग पर रोक, किसी भी गवाह से संपर्क न करने, और केवल परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों व करीबी दोस्तों से मिलने की अनुमति दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद एक बार फिर 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश मामले पर बहस तेज हो गई है। अब सभी की निगाहें ट्रायल की प्रगति और आने वाले महीनों में अदालत के अगले कदम पर टिकी हैं।

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CCTV में कैद दबंगई: जिम विवाद में महिला से छेड़छाड़, बेटे को निर्वस्त्र कर पीटा

नई दिल्ली।
पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर इलाके से दबंगई और बर्बरता की एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहां जिम से जुड़े विवाद में एक परिवार को बेरहमी से निशाना बनाया गया। इस सनसनीखेज वारदात का सीसीटीवी वीडियो सामने आने के बाद इलाके में हड़कंप मच गया है। घटना 2 जनवरी की बताई जा रही है, जिसमें दबंगों ने न सिर्फ परिवार के मुखिया की पिटाई की, बल्कि महिला से छेड़छाड़ और बेटे को निर्वस्त्र कर सड़क पर पीटने जैसी अमानवीय हरकत को भी अंजाम दिया।

पीड़ित राजेश गर्ग ने बताया कि उनके घर के बेसमेंट में एक जिम संचालित होता है, जिसकी देखरेख का जिम्मा सतीश यादव के पास था। आरोप है कि समय के साथ सतीश यादव ने जिम पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया और इसी को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद चल रहा था।

राजेश गर्ग के अनुसार, 2 जनवरी को वह अपनी पत्नी के साथ बेसमेंट में पानी के रिसाव की जांच करने गए थे। इसी दौरान सतीश यादव अपने कुछ साथियों के साथ वहां पहुंच गया। बातों-बातों में विवाद बढ़ गया और आरोपियों ने राजेश गर्ग पर हमला कर दिया। पीड़ित का कहना है कि उन्हें बेरहमी से पीटा गया और उनकी पत्नी के साथ छेड़छाड़ की गई।

स्थिति तब और भयावह हो गई जब उनका बेटा बीच-बचाव के लिए सामने आया। आरोप है कि दबंगों ने युवक को पकड़कर सड़क पर निर्वस्त्र किया और उसके साथ भी मारपीट की। यह पूरी घटना आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों में कैद हो गई, जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। फुटेज में आरोपी खुलेआम कानून को चुनौती देते नजर आ रहे हैं।

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू की। पुलिस ने पीड़ित की शिकायत के आधार पर केस दर्ज कर लिया है और मुख्य आरोपी सतीश यादव को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं, अन्य आरोपी विकास यादव, शुभम यादव और ओंकार यादव फिलहाल फरार हैं, जिनकी तलाश में पुलिस लगातार दबिश दे रही है।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की गहन जांच की जा रही है। सभी आरोपियों की भूमिका की पुष्टि के बाद उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

इस घटना के बाद लक्ष्मी नगर इलाके में दहशत का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की वारदातें सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं। पीड़ित परिवार ने आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है ताकि भविष्य में कोई भी कानून हाथ में लेने की हिम्मत न कर सके।

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दिल्ली दंगा केस: उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत खारिज, 5 आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से राहत

नई दिल्ली।
supreme court ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित साजिश से जुड़े बहुचर्चित मामले में आज अहम फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं, जबकि इसी मामले में अन्य पांच आरोपियों को जमानत दे दी गई है। इस फैसले को दंगा मामले में न्यायिक प्रक्रिया की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।

न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने विस्तृत सुनवाई के बाद यह निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम के खिलाफ लगे आरोपों की प्रकृति और उपलब्ध सामग्री को देखते हुए इस स्तर पर जमानत देना उचित नहीं होगा। वहीं, अन्य पांच आरोपियों के मामलों में अदालत ने परिस्थितियों और तथ्यों को अलग मानते हुए उन्हें राहत दी।

उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपियों पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा के “मुख्य साजिशकर्ता” होने का आरोप है। पुलिस का दावा है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) के विरोध के नाम पर सुनियोजित तरीके से हिंसा को अंजाम दिया गया। इन आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

फरवरी 2020 में हुए इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। बड़े पैमाने पर संपत्ति को नुकसान पहुंचा और कई इलाकों में लंबे समय तक तनाव की स्थिति बनी रही। पुलिस जांच में दावा किया गया कि हिंसा अचानक नहीं, बल्कि एक साजिश के तहत फैलाई गई, जिसके तार कुछ छात्र नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से जुड़े बताए गए।

इससे पहले, दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी दंगों की साजिश से जुड़े मामले में उमर खालिद समेत अन्य आरोपियों को जमानत देने से 2 सितंबर को इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद आरोपियों ने supreme court का रुख किया था। शीर्ष अदालत में हुई सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोप निराधार हैं और अभियोजन पक्ष के पास ठोस सबूतों का अभाव है। वहीं, सरकार और अभियोजन ने कहा कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और आरोप गंभीर प्रकृति के हैं।

supreme court के आज के फैसले के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम को फिलहाल जेल में ही रहना होगा। दूसरी ओर, जिन पांच आरोपियों को जमानत मिली है, उनके लिए अदालत ने कुछ शर्तें भी तय की हैं, जिनका पालन करना अनिवार्य होगा। कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला UAPA के तहत दर्ज मामलों में जमानत के मानकों को लेकर एक बार फिर बहस को तेज करेगा।

इस निर्णय के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। जहां एक ओर पीड़ित पक्ष और सरकार इसे न्यायिक प्रक्रिया का अहम कदम बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ संगठनों का कहना है कि मामले की निष्पक्षता और लंबी न्यायिक हिरासत पर सवाल उठते रहेंगे। अब सभी की नजरें इस केस में आगे की सुनवाई और ट्रायल की दिशा पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में कई अहम सवालों के जवाब दे सकती है।

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दिल्ली में 7 जगह लोक अदालत का ऐलान 1.80 लाख चालान मामलों का समाधान

ई दिल्ली।
राजधानी दिल्ली में यातायात नियमों के उल्लंघन से जुड़े लंबित चालानों के निपटारे के लिए 10 जनवरी को एक बड़ी पहल की जा रही है। दिल्ली राज्य विधिक सेवाएं प्राधिकरण (DSLSA) और delhi traffic police के संयुक्त तत्वावधान में दिल्ली की सात जिला अदालतों में लोक अदालत का आयोजन किया जाएगा। इस लोक अदालत के माध्यम से करीब 1.80 लाख लंबित ट्रैफिक चालानों का निपटारा किए जाने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे आम नागरिकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

अधिकारियों के अनुसार, यह लोक अदालत केवल उन्हीं चालानों पर विचार करेगी जो समझौता योग्य (Compounding) हैं और जिन्हें 30 नवंबर 2025 तक वर्चुअल कोर्ट में भेजा जा चुका है। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को सरल, तेज और नागरिकों के लिए सुलभ बनाना है, ताकि वर्षों से लंबित मामलों का समयबद्ध समाधान हो सके।

लोक अदालत का आयोजन पटियाला हाउस, कड़कड़डूमा, तीस हजारी, साकेत, रोहिणी, द्वारका और राउज एवेन्यू कोर्ट में किया जाएगा। इन सभी अदालत परिसरों में एक साथ सुनवाई होगी, जिससे अधिक से अधिक मामलों का निपटारा एक ही दिन में संभव हो सके।

delhi traffic police ने नागरिकों की सुविधा के लिए चालान और नोटिस डाउनलोड करने की व्यवस्था भी की है। सोमवार से सुबह 10 बजे लिंक सक्रिय होगा, जिसके बाद लोग delhi traffic police की आधिकारिक वेबसाइट से अपने चालान या नोटिस डाउनलोड कर सकेंगे। प्रत्येक दिन अधिकतम 45 हजार चालान डाउनलोड किए जा सकेंगे और यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक कुल 1.80 लाख चालानों की सीमा पूरी नहीं हो जाती।

नागरिक https://traffic.delhipolice.gov.in/notice/lokadalat लिंक पर जाकर अपने चालान या नोटिस की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। लोक अदालत में तय की गई राशि का भुगतान कर चालान का निपटारा किया जा सकेगा, जिससे न केवल आर्थिक बोझ कम होगा बल्कि अदालतों पर बढ़ते मामलों का दबाव भी घटेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि लोक अदालतें वैकल्पिक विवाद समाधान का प्रभावी माध्यम हैं, जहां बिना लंबी कानूनी प्रक्रिया के आपसी सहमति से मामलों का निपटारा होता है। दिल्ली में आयोजित यह लोक अदालत न सिर्फ ट्रैफिक चालान मामलों को सुलझाने में मददगार साबित होगी, बल्कि नागरिकों में यातायात नियमों के प्रति जागरूकता भी बढ़ाएगी।

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Justice For Goa | सिस्टम की मिलीभगत और लालच की भेंट चढ़ीं 25 मासूम जानें, जंतर-मंतर पर न्याय की गूँज

– दिल्ली दर्पण ब्यूरो 

नई दिल्ली: राजधानी का जंतर-मंतर आज उस वक्त सिसक उठा जब गोवा के ‘बर्च बाय रोमियो लेन’ अग्निकांड में मारे गए 25 लोगों के परिजन न्याय की गुहार लेकर सड़कों पर उतरे। 6-7 दिसंबर की उस काली रात को हुई इस “मानव निर्मित त्रासदी” ने न केवल 20 कर्मचारियों और 5 पर्यटकों की जान ली, बल्कि सरकारी तंत्र के उस भ्रष्टाचार को भी नंगा कर दिया जो चंद पैसों के लिए सुरक्षा मानकों को ताक पर रख देता है। प्रदर्शनकारियों ने सीधा आरोप लगाया कि यह हादसा नहीं बल्कि “व्यापारिक लालच” द्वारा की गई सामूहिक हत्या है, जहाँ प्रशासन की नाक के नीचे बिना किसी वैध फायर एनओसी या सुरक्षा अनुमति के मौत का यह जाल बुना जा रहा था। अपनों की तस्वीरें सीने से लगाए पीड़ितों ने सरकार को चेतावनी दी है कि जब तक दोषियों को उनके अंजाम तक नहीं पहुँचाया जाता, यह आंदोलन थमेगा नहीं।

इस पूरे मामले में व्यवस्था की मिलीभगत तब और स्पष्ट हो गई जब पीड़ितों के वकील अधिवक्ता विष्णु जोशी ने सनसनीखेज खुलासा किया कि क्लब का आबकारी लाइसेंस तक एक फर्जी स्वास्थ्य एनओसी के आधार पर हासिल किया गया था। जांच में यह कड़वा सच सामने आया है कि क्लब के पास न तो कोई वैध ट्रेड लाइसेंस था और न ही अग्निशमन विभाग की अनुमति, फिर भी यह धड़ल्ले से चल रहा था। अधिवक्ता जोशी के अनुसार, धोखाधड़ी और जालसाजी के लिए अलग से प्राथमिकी दर्ज की गई है और अब कानूनी टीम इस मामले को फास्ट-ट्रैक कोर्ट में ले जाने की तैयारी कर रही है ताकि समयबद्ध न्याय सुनिश्चित हो सके। फिलहाल लूथरा भाइयों की अग्रिम जमानत का कड़ा विरोध किया जा रहा है और अजय गुप्ता की रिमांड के बाद अब सबकी नजरें कोर्ट के अगले रुख पर टिकी हैं।

शोक संतप्त परिवारों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है और उनकी मांगें स्पष्ट हैं: दोषियों को किसी भी कीमत पर जमानत न मिले और इस पूरे खेल में शामिल “ब्लड मनी” की जांच सीबीआई (CBI) व ईडी (ED) जैसी केंद्रीय एजेंसियों से कराई जाए। भावना जोशी जैसी पीड़ितों, जिन्होंने अपना पूरा संसार इस आग में खो दिया, ने भावुक अपील करते हुए कहा कि यह लड़ाई अब केवल उनके परिवारों की नहीं बल्कि हर उस भारतीय की है जो किसी रेस्तरां या क्लब में कदम रखता है。 प्रदर्शनकारियों ने इस मामले को ‘रैरेस्ट ऑफ रेयर’ की श्रेणी में रखकर क्लब मालिकों के लिए मृत्युदंड और अनाथ हुए बच्चों के भविष्य के लिए तत्काल मुआवजे की मांग की है। कैंडललाइट विजिल के साथ समाप्त हुए इस प्रदर्शन ने साफ कर दिया है कि अब व्यवस्था की लापरवाही को और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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