Tuesday, May 19, 2026
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“सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने पीएम मोदी को भेजी याचिका; देश में ‘राष्ट्रीय जल प्रबंधन नीति’ और ‘अंतर्देशीय जलमार्ग नेटवर्क’ बनाने की मांग”

  • डिल्ली दर्पण ब्यूरो
    नई दिल्ली: देश में गहराते जल संकट, लगातार आ रहे बाढ़-सूखे के थपेड़ों और किसानों की बदहाली को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक विस्तृत और नीतिगत आवेदन (Representation) भेजा है. अधिवक्ता गोवर्धन दास अग्रवाल और सुल्तान सिंह खत्री द्वारा जनहित में भेजे गए इस कानूनी दस्तावेज में देश में तत्काल एक सख्त ‘राष्ट्रीय जल प्रबंधन और सतत सिंचाई अधिनियम’ लागू करने और कृषि को बचाने के लिए बड़े स्तर पर प्रशासनिक व ढांचागत सुधार करने की पुरज़ोर वकालत की गई है. 
    याचिकाकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) अब कोई दूर का खतरा नहीं बल्कि एक कड़वा सच बन चुका है, जिससे देश के करोड़ों किसानों का अस्तित्व खतरे में है. इसलिए अब टुकड़ों में योजनाएं बनाने के बजाय एक मजबूत, कानूनी रूप से बाध्यकारी राष्ट्रीय जल नीति की आवश्यकता है. 
    आधी से ज्यादा खेती रामभरोसे: याचिका में उठाए गए मुख्य मुद्दे
    अधिवक्ताओं ने देश की जल व्यवस्था में मौजूद कई गंभीर कमियों को आंकड़ों के साथ उजागर किया है:
  • मानसून पर अत्यधिक निर्भरता: देश के कुल कृषि क्षेत्र का करीब 52% (लगभग 140 मिलियन हेक्टेयर) हिस्सा आज भी सिंचाई व्यवस्था से बाहर है और पूरी तरह मानसून पर निर्भर है. भारत में होने वाली कुल बारिश का 75% से अधिक हिस्सा मानसून के महज 90 से 100 दिनों में ही बरस जाता है, जिसका सही संचयन न होने के कारण भारी मात्रा में मीठा पानी बर्बाद हो जाता है. 
  • बाढ़ और सूखे का दोहरा थपेड़ा: यह देश का बड़ा विरोधाभास है कि जहां एक तरफ देश का 51% हिस्सा सूखे की मार झेलता है, वहीं दूसरी तरफ हर साल लगभग 40 मिलियन हेक्टेयर जमीन बाढ़ की चपेट में आ जाती है, जिससे सालाना ₹1,80,000 करोड़ से अधिक का आर्थिक नुकसान होता है. 
  • पाताल से अंधाधुंध पानी की निकासी: भारत दुनिया में सबसे ज्यादा (करीब 25% वैश्विक हिस्सा) भूजल निकालने वाला देश बन गया है. केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (CGWB) के मुताबिक देश के कई ब्लॉक और तालुका ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ या क्रिटिकल श्रेणी में आ चुके हैं. 
  • सिंचाई प्रणालियों की विफलता: आजादी के बाद से सिंचाई बुनियादी ढांचे पर ₹3,00,000 करोड़ से अधिक खर्च होने के बावजूद भारत में सतही सिंचाई की दक्षता महज 35% से 40% है, जो विकसित देशों (60-70%) के मुकाबले बेहद कम है. 
    प्रमुख मांगें: नया कानून, नेशनल वाटर ग्रिड और हर गांव में जलाशय
    सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने सरकार के समक्ष निम्नलिखित प्रमुख राहतें और मांगें रखी हैं:
  1. राष्ट्रीय जल प्रबंधन प्राधिकरण (NWMA) का गठन: संसद के माध्यम से एक नया अधिनियम लाकर एक शक्तिशाली वैधानिक संस्था बनाई जाए. पानी को ‘पब्लिक ट्रस्ट’ घोषित किया जाए और इसके अवैध दोहन या बर्बादी पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान हो. 
  2. नदियों को जोड़ना और नहरों का पक्कीकरण: बाढ़ वाले बेसिनों से पानी को सूखे इलाकों तक पहुंचाने के लिए ‘नेशनल वाटर ग्रिड’ और नदी-जोड़ो परियोजनाओं में तेजी लाई जाए. देश की सभी नहरों का आधुनिकीकरण और पक्कीकरण (Lining) किया जाए ताकि पानी का रिसाव रोका जा सके. 
  3. हर राजस्व गांव में जल भंडारण: देश के सूखा प्रवृत्त जिलों के प्रत्येक राजस्व गांव (Revenue Village) में कम से कम एक चेक डैम, फार्म पोंड या जलाशय का निर्माण अनिवार्य किया जाए. इसके साथ ही जोहड़, बावड़ी, कुंड और तालाबों जैसे पारंपरिक जल निकायों के जीर्णोद्धार के लिए एक विशेष ‘हेरिटेज वाटर बॉडी रिस्टोरेशन प्रोग्राम’ चलाया जाए. 
  4. 90 दिनों के भीतर एक्शन प्लान: याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय और कृषि मंत्रालय मिलकर एक ‘संयुक्त विशेषज्ञ टास्क फोर्स’ बनाएं जो इस आवेदन पर विचार कर 90 दिनों के भीतर एक समयबद्ध कार्ययोजना सौंपे. 
    परिवहन और कृषि का अनूठा विज़न: ‘इनलैंड वाटरवेज नेटवर्क’
    इस आवेदन की सबसे खास बात जल प्रबंधन को देश के लॉजिस्टिक्स और परिवहन व्यवस्था से जोड़ने का अनूठा विज़न है. वकीलों ने एक ‘एकीकृत राष्ट्रीय अंतर्देशीय जल परिवहन प्रणाली’ विकसित करने का प्रस्ताव दिया है. 
    इसके तहत समुद्री बंदरगाहों को नदियों और बड़ी नहरों के नेटवर्क के जरिए सीधे देश के आंतरिक हिस्सों, छोटे शहरों और ग्रामीण बेल्ट से जोड़ने की बात कही गई है. यह नेटवर्क न केवल कृषि उपजों को मंडियों तक पहुंचाने में मदद करेगा, बल्कि विदेशों से आयात होने वाले कच्चे तेल, मशीनरी और आवश्यक सामानों को बेहद कम लागत में देश के कोने-कोने तक पहुंचा सकेगा. 
    अधिवक्ताओं के अनुसार, इस वाटरवेज नेटवर्क से सड़कों और रेलवे पर से माल ढुलाई का दबाव कम होगा, भारी मात्रा में डीजल-पेट्रोल की बचत होगी (जिससे ईंधन आयात पर देश की निर्भरता घटेगी), बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे और वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण में भारी गिरावट आएगी. 
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