दिल्ली दर्पण पूजा नागर रिपोर्ट नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में हर साल सड़क निर्माण और मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। इसके बावजूद मानसून आते ही कई इलाकों की सड़कें टूट जाती हैं, गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं और जलभराव की समस्या लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद सड़कों की हालत में स्थायी सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है।
दिल्ली में सड़क निर्माण और रखरखाव की जिम्मेदारी अलग-अलग एजेंसियों जैसे PWD, MCD, NDMC और NHAI के पास है। निर्माण कार्य के दौरान जूनियर इंजीनियर (JE), असिस्टेंट इंजीनियर (AE), एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (EE) सहित कई स्तर के अधिकारी गुणवत्ता की निगरानी के लिए जिम्मेदार होते हैं। इसके बावजूद कई स्थानों पर सड़कें कुछ ही महीनों में टूटने लगती हैं।
हर मानसून से पहले नालों की सफाई और जलभराव रोकने के दावे किए जाते हैं, लेकिन बारिश के बाद राजधानी के कई इलाकों में सड़कें पानी में डूब जाती हैं। इससे न केवल लंबा ट्रैफिक जाम लगता है, बल्कि सड़क दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है। खराब सड़कें और गड्ढे आम लोगों के लिए रोजाना की चुनौती बन चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क निर्माण में गुणवत्ता, समय-समय पर निरीक्षण और जवाबदेही सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। यदि निर्माण कार्य तय मानकों के अनुसार हो और दोषी पाए जाने पर संबंधित ठेकेदारों व अधिकारियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई की जाए, तो ऐसी समस्याओं में काफी हद तक कमी लाई जा सकती है।
जनता का कहना है कि टैक्स के रूप में दिए गए पैसे का उपयोग टिकाऊ और सुरक्षित सड़कें बनाने में होना चाहिए। ऐसे में सवाल केवल सड़क निर्माण का नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और सार्वजनिक सुरक्षा का भी है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि संबंधित एजेंसियां सड़क निर्माण की गुणवत्ता सुधारने और जलभराव जैसी समस्याओं से निपटने के लिए कितने प्रभावी कदम उठाती हैं।
