दिल्ली की राजनीति में उस समय हलचल मच गई जब पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक बेहद चौंकाने वाला ऐलान किया। केजरीवाल ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि अब उन्हें जस्टिस स्वर्णकान्ता शर्मा की अदालत से न्याय की कोई उम्मीद नहीं बची है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “जस्टिस स्वर्णकान्ता शर्मा जी से न्याय मिलने की मेरी उम्मीद टूट चुकी है।” इस घोषणा के साथ ही उन्होंने कानूनी प्रक्रिया के प्रति अपनी गहरी नाराजगी व्यक्त की है और अदालती लड़ाई के तरीके में एक बड़ा बदलाव करने का संकेत दिया है, जिसने सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।
केजरीवाल ने अपने इस कदम को ‘अंतरात्मा की आवाज़’ करार देते हुए इसे महात्मा गांधी के सिद्धांतों और सत्याग्रह की भावना से जोड़ा है। उन्होंने साफ कर दिया है कि अब वह इस मामले में न तो अदालत के सामने पेश होंगे और न ही अपना कोई पक्ष या दलील रखेंगे। उनका यह निर्णय कानूनी हलकों में काफी चर्चा का विषय है, क्योंकि किसी भी गंभीर मामले में बचाव पक्ष द्वारा दलीलें न रखने का फैसला एक असाधारण और चुनौतीपूर्ण कदम माना जाता है। इस फैसले के जरिए केजरीवाल ने एक तरह से न्याय प्रणाली के वर्तमान स्वरूप के प्रति अपने असंतोष को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केजरीवाल का यह रुख उनके खिलाफ चल रहे कानूनी मामलों में एक नया मोड़ ला सकता है। एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा इस तरह से अदालती कार्यवाही से खुद को दूर करने का फैसला आम आदमी पार्टी की भविष्य की रणनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। हालांकि, जहां एक ओर केजरीवाल इसे ‘सत्याग्रह’ की राह बता रहे हैं, वहीं इस पर विभिन्न राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। फिलहाल, हर किसी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उनके इस फैसले का अदालत की कार्यवाही और भविष्य के कानूनी परिणामों पर क्या असर पड़ेगा।
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