Patna High Court ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में पुलिस कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि बिना किसी न्यायालय या सक्षम प्राधिकारी के आदेश के किसी मकान का ताला तुड़वाकर कब्जा दिलाना अवैध है और पुलिस अधिकारों का दुरुपयोग माना जाएगा।
न्यायमूर्ति विवेक चौधरी की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पूर्व आदेश का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस के पास किसी भवन का कब्जा बहाल कराने का अधिकार नहीं था, फिर भी प्रवेश द्वार का ताला तुड़वाने में मदद की गई, जो प्रथम दृष्टया गैरकानूनी है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि पूर्व आदेश के बावजूद पुलिस ने याचिका में मांगी गई राहत पर कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद कोर्ट ने Muzaffarpur Police के पुलिस अधीक्षक को अगली सुनवाई तक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच के दौरान याचिकाकर्ता की पत्नी को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जाए।
दरअसल, मामला पति-पत्नी के बीच चल रहे वैवाहिक विवाद और उससे जुड़े विभिन्न मुकदमों से संबंधित है। कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच बढ़ते विवाद को देखते हुए पत्नी को मुजफ्फरपुर नगर क्षेत्र में वैकल्पिक आवास तलाशने की अनुमति दी है, जिसका किराया पति वहन करेगा।
मामले की अगली सुनवाई 19 जून 2026 को निर्धारित की गई है।
क्या है पूरा मामला?
मुजफ्फरपुर के निवासी कौस्तुब सौरभ की शादी नैन्सी कश्यप से दिसंबर 2020 में हुई लेकिन शादी के कुछ दिन बाद ही दोनों में विवाद रहने लगा और दोनों एक दूसरे से अलग थलग ही रहे। 2022 में बहू नैन्सी कश्यप अपने माता पिता के घर चली गई लेकिन अचानक 2 फरवरी 2024 को शाम के समय भारी पुलिस बल और एक दर्जन बाकी लोगों और अपने माता पिता के साथ कस्तुभ सौरभ के पैतृक आवास दीघरा गाँव पहुँच गई जो कि कस्तुभ सौरभ के माता पिता का साझा मकान है और वहाँ कब्जा कर लिया। इस पूरे कृत्य में स्थानीय पुलिस ने महिला का साथ दिया जबकि किसी कोर्ट से इस बाबत कोई आदेश नहीं था। बता दें कि कौस्तुभ सौरभ और नैन्सी के बीच तलाक का मामला 25 अप्रैल 2023 से कोर्ट में लंबित है जो कि कौस्तुभ सौरभ द्वारा ही फाइल किया गया था।
पुलिस की भूमिका पर भी सवाल, कब्जा करने में मददगार बनी पुलिस टीम
2 फरवरी 2024 को जब नैन्सी कश्यप दो जिप्सी पुलिस टीम और एक दर्जन से ज्यादा अन्य लोगों को ले कर अचानक दीघरा स्थित मकान पर पहुँची तो पुलिस की मौजूदगी में मकान का ताला तोड़ा गया। अवैध कब्जे में मदद करती पुलिस मकान में लगे CCTV कैमरे में कैद हुई जो साक्ष्य के तौर पर हाई कोर्ट में भी पेश किया गया और उच्च न्यायालय ने इसे संज्ञान में लेते हुए अपने आदेश में भी इसका जिक्र किया है। ऐसे में सवाल है कि आखिर पुलिस किस क्षमता में शाम के समय वहाँ पर पहुंची? किस अधिकारी के आदेश पर इतनी बड़ी टीम को मकान कब्जा के लिये महिला के साथ भेजा गया? क्या ये कानूनन सही था? क्या पुलिस टीम के रवानगी की कोई डायरी एंट्री हुई थी या फिर वापसी की?
कोर्ट के आदेश को अनसुना करती रही सदर थाना पुलिस!
पूरे मामले में पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठते हैं। कोर्ट के आदेश के बावजूद अब तक पीड़ित परिवार को पुलिस का कोई सहयोग नहीं मिला है। कोर्ट आदेश में भी ये लिखा गया है कि तमाम सूचना के बावजूद SHO साहब ने कोई ऐक्शन नहीं लिया। जब साझा मकान में कब्जा करने का कोई अधिकार कानूनन नहीं है ये बात न्यायालय कह रहा है तो पुलिस कब्जा करवाने क्यों पहुँचती है? ये सबसे बड़ा सवाल है। और यहीं पुलिस की भूमिका संदेह के घेरे में है। पुलिस को भली भांति ये संज्ञान में था कि ये वैवाहिक विवाद का मामला है और न्यायालय में इस बाबत याचिका लंबित है।

