Sunday, May 3, 2026
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एप के जरिए जानिए, डीटीसी बसो की जानकारी

खुशबू काबरा, संवाददाता

दिल्ली।। आपको बता दे कि डीटीसी बसो में जीपीएस डिवाइस पहले से ही उपल्बध है लेकिन वो जीपीएस डिवाइस ठीक तरह से काम नहीं कर रहे हैं। उसी को सोचते हुए डीटीसी बसो अब बेस्ट ट्रेकिंग सिस्टम लगया जा रहा है बता दे कि इसके बाद सभी बसो की जानकारी, लोकेशन और गतिविधि पर नजर रखी जाएगी। साथ ही सभी यात्रियो को बसो की जानकारी भी उपल्बध की जाएगी केवल ये ही नहीं जिन लोगो के पास स्मार्टपोन नहीं उनको एसएमएस के द्वारा जानकारी दी जाएगी।

एसा बताया जा रहा है कि आज भी दिल्ली मैट्रो इन डीटीसी बसो से ज्यादा भरोसेमंद है लोगो का ऐसा कहना है कि मैट्रो अपने निरधारित समय से पहुँच जाती है ट्रेन आने-जाने का समय यात्रियो को पता होता हैं यात्रियो का समय बरवाद नहीं होता और वह सही समय से अपने मुकाम पर पहुँच जाते है। ऐसा अगर डीटीसी बसो के साथ होने लग जाये तो ये लोगो के लिए और ज्यादा भरोसेमंद वह फायदेमंद ट्रांसपोर्ट र्सविस सावित होगी।

अब देखना ये होगा की ये ऐप कितनी फायदे मंद निकलती हैं लोगो के लिए और आखिर इस ऐप पर लोगो का कितना भरोसा बन पाता हैं और कितना नहीं।

गुलाबी बाग में पानी के लिए तरसे लोग, प्रदर्शन जारी

खुशबू काबरा, संवाददाता

नई दिल्ली।। दिल्ली के गुलाबी बाग में स्थित दिल्ली जल बोर्ड कार्यालय पर पानी नहीं मिलने पर प्रर्दशन लगातार जारी है। लोगों का यह कहना है कि हमें पानी नहीं उपलब्ध हो पा रहा हैं। पानी की समस्या एक दिन की नहीं, बल्कि रोजमर्रा की समस्या बन गई है। राज्य सरकार चुनाव के समय वादों की झड़ी लगा देती है और दूसरी तरफ नोटों से वोट बना लेती है फिर क्यों अपने वादों को पूरा करना भूल जाती हैं।

आपको बता दें कि कर्मचारियों की तनख्वाह पिछले दो महीनों से नहीं दी जा रही हैं, जिसकी वजह से उनको हड़ताल पर जाना पड़ गया। लोगों के शिकायत करने के बावजूद भी प्रशासन उनकी बात को अनसुनी कर रहा है। ऐसे में यहां के लोग बूंद. बूंद पानी को तरस रहे हैं लेकिन समस्याओं का समाधान अधिकारी नहीं दे पा रहे हैं।

जो कर्मचारी लोगों को घर-घर पानी पहुँचाते हैं, आज वो खुद हीं पानी को तरस रहे हैं। ऐसे में लोग केजरीवाल के खिलाफ नारे लगाते थक नहीं रहे हैं।

केजरीवाल खुद दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष होने के नाते लोगों से बोलते कुछ और हैं निभाते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं। दिल्ली जल बोर्ड लगातार घाटे में चल रहा हैं पर केजरीवाल का खेल लगातार जारी हैं। अब देखना यह होगा कि आगे क्या होता है।

जल बोर्ड कर्मचारियों के वेतन को लेकर प्रदर्शन

काव्या बजाज, संवाददाता

नई दिल्ली।। दिल्ली जल बोर्ड के कर्मचारियों ने 21 दिसंबर को गुलाबी बाग में प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि दिल्ली सरकार ने दो महीने से उनकी तनख्वाह नहीं दे है । जिन कर्मचारियों ने कोरोना काल में अपनी जान को जोखिम में डाल कर जनता की सेवा की है वो कर्मचारी आज हड़ताल करने पर विवश है। बातचीत के दौरान कर्मचारियों ने बताया कि वेतन ना मिलने की वजह से घर चलाना मुश्किल हो रहा है और अगर ऐसे ही चलता रहा तो दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं हो पाएगी।

वही दूसरी तरफ दिल्ली की जनता को भी दुविधाएं झेलनी पड़ रही है। पिछले एक हफ्ते से उनके घरों में पानी की एक बूँद तक नहीं है जिसकी वजह से उनके मन में सरकार के लिए रोष की भावना पैदा हो गई है । उनका कहना है कि केजरीवाल ने पानी माफ बोल कर उनके घरों से पानी को ही हटा दिया है । प्यास से बिलबिलाते लोगों ने केजरीवाल मुर्दाबाद के नारे भी लगाए।

जहाँ मुख्यमंत्री केजरीवाल एक तरफ लोगों से ये वादा करते है कि वो दिल्ली की जनता को मुफ्त का पानी देंगे वही दूसरी तरफ लोगों को प्यास की वजह से परेशानियाँ झेलनी पड़ रही है। इन सब को देख कर समझा जा सकता है कि सरकार चुनावों के समय लोगों के आगे सिर्फ वादों की झड़ी लगाना ही जानती है लेकिन बाद में हकीकत कुछ और ही सामने आती है तो आगे देखना ये होगा कि कर्मचारियों और जनता की परेशानियों का समाधान निकालने के लिए सरकार कोई कदम उठाती है या नहीं ।

दिल्ली में सात सौ साल पुराना मठ आज भी है भक्ति का प्रमुख केंद्र

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डिम्पल भारद्वाज, संवाददाता

नई दिल्ली।। बाबा श्याम गिरी संवाई मठ को गुर्जर, और खासकर डेढ़ा समाज की आस्था के प्रतीक के रुप में जाना जाता है। यमुनापर स्थित इस मंदिर में गुर्जर समाज के लोग दूर-दूर से बाबा के दर्शन करने आते हैं। इस मठ में पूर्वी और उत्तर-पूर्वी दिल्ली में गुर्जर समाज के डेढ़ा गोत्र के चौबीस गांव हैं। उनकी आस्था बाबा श्याम गिरी संवाई मठ से जुड़ी हुई है।

मंदिर के मुख्य द्वार से अंदर के साथ ही सबसे पहले भगवान शिव के प्रिय भक्त और वाहन नन्दी के दर्शन होते हैं। वे मंदिर के ठीक सामने विराजमान हैं। नन्दी के सामने ही मंदिर का मुख्य द्वार है, जिसमें प्रवेश करने पर हिन्दू धर्म के सभी पूजनीय देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित हैं। वहीं इसी मंदिर के प्रांगण में मठाधीश महन्त श्री रमन गिरि जी महाराज(चौबीस ग्राम) श्रृद्धालुओं को आशिर्वाद देते हैं। ठीक उसी के पास एक अखण्ड ज्योति और अखण्ड धूनी हर वक्त जलती रहती है, जो इस मठ की शक्ति और भक्ति का प्रतीक है।

करीब 7 सौ साल पुराने यह मठ को लगभग 10 एकड़ में फैला है और इस मठ के कई हिस्से हैं। पहले हिस्से में भगवान शिव का प्रचीन और भव्य मंदिर है। जहां भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित है। कुछ बड़े—बुजुर्ग बताते हैं कि शिवलिंग की स्थापना प्राचीन समय में ही हो गई थी। यही वजह है कि सावन महीने में मंदिर में बाबा भोलेनाथ की विशेष अराधना के लिये हर समाज से लोग दूर-दराज से आते हैं। इस मठ में एक गुफा भी है, जहां मठ के प्रथम मठाधीश की समाधी है। श्रृद्धालु समाधी के दर्शन कर दण्डवत प्रणाम करते हैं। इसी मंदिर के नीचे एक और मंदिर स्थित है, जिसमें देवी-देवताओं की प्रतिमा के साथ ही श्रीश्याम बाबागिरी संवई जी की भी प्रतिमा मौजूद है। मंदिर के ठीक पीछे एक बरगद का पेड़ है। मान्यता है कि इसी पेड़ के नीचे बैठकर श्री श्याम बाबागिरि संवई जी ने तपस्या की थी। 

मंदिर के बांई तरफ मंदिर की ओर से श्रृद्धालुओं को प्रतिदिन भोजन कराया जाता है। प्रत्येक रविवार के दिन यहां विशेष कीर्तन और भंडारे का आयोजन किया जाता है। मंदिर के ठीक सामने एक हवनकुंड बना है, जहां विशेष अनुष्ठान के आयोजनों पर हवन किए जाते हैं। श्रृद्धालु इस हवन कुंड की परिक्रमा करते हैं। मंदिर के दूसरे हिस्से में एक गौशाला है, जहां महंत गिरिजी महाराज गौ-सेवा करते हैं। भक्त भी यहां गौ-सेवा के लिये दान देकर जाते हैं। मठ 7 सौ साल पुराना है लिहाज़ा इसकी मान्यता भी उतनी ही बड़ी है यहां बड़ी संख्या में साधू-संत सेवा और अराधना के लिये पहुंचते हैं। लिहाज़ा उनके ठहरने के लिये भी मठ में विशेष इंतज़ाम किये जाते हैं।

मंदिर के एक छोटे से हिस्से में एक अस्तबल बना हुआ है, जहां एक सुंदर श्वेत घोड़ा बंधा रहता है। इस घोड़े की खासियत है कि वह मठाधीश के अलावा किसी दूसरे व्यक्ति को सवारी नहीं करने देता। मठ की इन तमाम विशेषताओं के बाद अब एक विशेषता और इसके साथ जल्द जुड़ने वाली है क्योंकि यहां गरीब बच्चों को लिये गुरुकुल का निर्माण कराया जा रहा है, ताकि गरीब और जरुरतमंद बच्चे पढाई—लिखाई के साथ ही मंत्रोच्चारण भी सीख सकें।

न्यूनतम समर्थन राशी (MSP) की शुरुआत कब की गई थी

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काव्या बजाज, संवाददाता||

दिल्ली || जिस एम एस पी पर किसान पिछले कई दिनों से आंदोलन कर रहे है उस न्यूनतम समर्थन राशी (MSP) की शुरुआत प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के शासन में हुई थी। 1 अगस्त 1964 में एक समिति बनाई गई जो अनाजों की कीमत तय तरने के लिए बनाई गई थी क्योंकी किसानों को ये डर था कि अगर अधिक मात्रा में फसलें उगाई जाएंगी तो उन्हें अच्छी कीमत नहीं मिल पाएगी ।

क्या होता है न्यूनतम समर्थन राशी (MSP)?

दरअसल किसान अगर अपनी फसल बेचने में असमर्थ होतें है तो सरकार MSP पर उनकी फसलें खरीद लेती है जिससे किसानों को नुकसान नहीं उठाना पडता । और यही अनाज बाद में गरीबों को कम राशी में दिया जाता है ।

न्यूनतम समर्थन राशी (MSP) का उद्देशय

केंद्र सरकार फसल की बुवाई से पहले या बुवाई के समय न्यूनतम समर्थन राशी की घोषणा करती है । एम एस पी का उद्देशय किसानों की आय को बढ़ाना और उन्हें संकट से बचाना है ।

सबसे पहले किस फसल पर MSP लागू किया गया था ?

1966 – 1967 में एम एस पी सिर्फ गेहूँ पर लागू किया गया था। जिससे देश में किसानों ने अधिक मात्रा में गेहूँ की फसल उगाई थी और इस वजह से देश में बाकी अनाज की कमी हो गई थी। जिसके बाद इसे बाकी फसलें जैसे गेहूं, मक्का, जई, जौ, बाजरा, चना, अरहर, मूंग, उड़द, मसूर, सरसों, सोयाबीन, शीशम, सूरजमूखी, गन्ना और बाकी फसलों पर भी लागू किया गया। और वर्तमान में सरकार 25 फसलों पर MSP लागू करती है।

कैसे तैय होता है न्यूनतम समर्थन राशी (MSP) ?

MSP तैय करने के लिए एक कमेटी बनाई गई है जो फसलों की लागत। फसलों को उगाने में लगने वाली चीज़ो के दाम, बाज़ारों में मौजूद कीमतों और ऐसी ही चीज़ो को ध्यान में रखते हुए MSP तैय करती है।