Wednesday, May 6, 2026
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मैक्स हॉस्पिटल के बाहर पार्किंग का खेल: एम्बुलेंस के लिए आफत, ठेकेदार की मौजपुलिस ने की बड़ी कार्रवाई, कई गाड़ियां जब्त; दिल्ली दर्पण टीवी की ग्राउंड रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

नई दिल्ली, शालीमार बाग: राजधानी के शालीमार बाग स्थित मैक्स हॉस्पिटल के बाहर इन दिनों पार्किंग को लेकर विवाद गहरा गया है। एक तरफ जहां सरकार क्षेत्र में विकास के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ अस्पताल के गेट के ठीक सामने चल रही पार्किंग मरीजों और एम्बुलेंस के लिए जी का जंजाल बन गई है। दिल्ली दर्पण टीवी की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया है कि अस्पताल के मुख्य गेट के बाहर सड़क के दोनों तरफ भारी-भरकम पार्किंग शुल्क वसूला जा रहा है, जिससे न केवल यातायात बाधित हो रहा है बल्कि आपातकालीन सेवाओं पर भी संकट मंडरा रहा है।

एम्बुलेंस चालकों को दी जा रही धमकी ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान पाया गया कि अस्पताल के गेट पर सालों से खड़ी होने वाली निजी एम्बुलेंस को पार्किंग ठेकेदार के करिंदे वहां से जबरन हटा रहे हैं। एम्बुलेंस चालकों का आरोप है कि उन्हें वहां खड़े होने पर परेशान किया जाता है ताकि उस जगह का इस्तेमाल पार्किंग शुल्क वसूलने के लिए किया जा सके। चालकों का कहना है कि एम्बुलेंस को अस्पताल से दूर खड़ा करने के कारण गंभीर मरीजों को लाने-ले जाने में कीमती समय बर्बाद हो रहा है।

पुलिस का बड़ा एक्शन मामले की गंभीरता को देखते हुए ट्रैफिक पुलिस ने मौके पर बड़ी कार्रवाई की है। हालांकि ठेकेदार का दावा है कि उसने 5 महीने पहले ही एमसीडी से टेंडर लिया है और पीली लाइन के अंदर ही गाड़ियां खड़ी करवाई जा रही हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही दिखी। पीली लाइन के बाहर सड़क घेरकर खड़ी की गई कई गाड़ियों को पुलिस ने क्रेन की मदद से जब्त किया और चालान काटे। पुलिस की मौजूदगी के बावजूद वहां जाम की स्थिति बनी रही।

जनता का सवाल: अस्पताल की पार्किंग होने के बाद सड़क पर वसूली क्यों? स्थानीय निवासियों और मरीजों के परिजनों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि जब मैक्स हॉस्पिटल के पास अपनी निजी पार्किंग की बड़ी व्यवस्था मौजूद है, तो अस्पताल के ठीक बाहर मुख्य सड़क पर महंगी पार्किंग का ठेका क्यों दिया गया? क्या प्रशासन की कमाई किसी मरीज की जान से ज्यादा कीमती है?

इस ग्राउंड रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि शालीमार बाग में विकास के दावों के बीच ‘पार्किंग सिंडिकेट’ आम जनता और मरीजों के अधिकारों का हनन कर रहा है। अब देखना यह है कि क्या एमसीडी इस विवादित पार्किंग स्थल को हटाती है या मरीजों की जान इसी तरह जोखिम में बनी रहेगी।

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2 लाख के लालच में देशद्रोह: आतंकी पन्नू से जुड़े 2 स्लीपर सेल गिरफ्तार

नई दिल्ली। गणतंत्र दिवस से ठीक पहले राजधानी दिल्ली में अशांति फैलाने की खालिस्तानी साजिश को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने नाकाम कर दिया है। पुलिस ने प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस’ (SFJ) से जुड़े दो स्लीपर सेल को गिरफ्तार किया है, जो आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के लिए काम कर रहे थे। आरोप है कि दोनों ने पैसों के लालच में दिल्ली के दो अलग-अलग इलाकों में खालिस्तानी नारे लिखे थे।

पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार आरोपियों ने 26 जनवरी से पहले माहौल खराब करने के इरादे से दिल्ली में दो स्थानों पर “खालिस्तान जिंदाबाद” जैसे प्रो-खालिस्तान नारे लिखे। इसके बदले उन्हें दो लाख रुपये देने का वादा किया गया था। जांच में सामने आया है कि इन दोनों को यह काम कनाडा में बैठे नेटवर्क के जरिए सौंपा गया था।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान बलजिंदर और रोहित उर्फ कीरथ के रूप में हुई है। बलजिंदर दिल्ली में एंबुलेंस चलाने का काम करता है, जबकि रोहित उसका करीबी साथी बताया जा रहा है। पुलिस का कहना है कि दोनों को पन्नू के एक करीबी ने हायर किया था, जो खुद दिल्ली के तिलक नगर का रहने वाला है और घटना से कुछ दिन पहले ही कनाडा चला गया था। वहीं से वह सीधे आतंकी पन्नू के संपर्क में था और पूरी साजिश को अंजाम दे रहा था।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, यह पूरी योजना कनाडा में बैठकर तैयार की गई थी। मकसद था गणतंत्र दिवस से पहले देश की राजधानी में डर और अस्थिरता का माहौल बनाना। फिलहाल पुलिस पन्नू के अन्य करीबियों और इस नेटवर्क से जुड़े लोगों की तलाश में जुटी हुई है।

इस मामले में 23 जनवरी को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एफआईआर दर्ज की थी। एफआईआर में आतंकवादी घोषित गुरपतवंत सिंह पन्नू पर राष्ट्रीय राजधानी में अशांति फैलाने की धमकी देने का आरोप लगाया गया है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196, 197, 152 और 61 के तहत मामला दर्ज किया है। ये धाराएं विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता फैलाने, राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाने, भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने तथा आपराधिक साजिश से जुड़ी हैं।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई पन्नू द्वारा सोशल मीडिया पर जारी एक वीडियो संदेश के बाद तेज की गई थी, जिसमें उसने 26 जनवरी से पहले दिल्ली में कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की धमकी दी थी। दिल्ली पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

स्पेशल सेल अब इस बात की भी जांच कर रही है कि आरोपियों को अब तक कितनी रकम मिली और इस साजिश में और कौन-कौन लोग शामिल हैं।

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केशवपुरम ज़ोन या ‘कमीशन ज़ोन’ ? : 1 करोड़ की रिश्वत में बिकी MCD की ईमानदारी, सील बिल्डिंग पर चढ़ा भ्रष्टाचार का नया पेंट !

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-राजेंद्र स्वामी , दिल्ली दर्पण 

नई दिल्ली: दिल्ली नगर निगम के केशवपुरम ज़ोन में कानून अब अधिकारियों की मेजों के नीचे दफन हो चुका है। वज़ीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया की बिल्डिंग A-91 अब महज़ एक अवैध निर्माण नहीं, बल्कि दिल्ली नगर निगम की बेशर्मी का सबसे बड़ा स्मारक बन चुकी है। दिल्ली दर्पण टीवी द्वारा सबूतों के साथ इस काले खेल को बेनकाब करने के एक महीने बाद भी, निगम के डीसी और इंजीनियरों का ‘बिल्डर प्रेम’ थमने का नाम नहीं ले रहा है। इलाके में दबी जुबान में नहीं, बल्कि अब खुलेआम चर्चा है कि इस अवैध ‘महल’ को ढाल देने के लिए 1 करोड़ रुपये का ‘नज़राना’ अफसरों और सफेदपोशों की तिजोरियों तक पहुँच चुका है। आखिर और क्या वजह हो सकती है कि लिखित शिकायत, वीडियो सबूत और कोर्ट के डंडे के बावजूद, केशवपुरम ज़ोन के अधिकारियों को यह चार-मंज़िला अवैध इमारत दिखाई नहीं दे रही ? क्या डीसी साहब की आँखों पर भ्रष्टाचार के चश्मे ने मोतियाबिंद का काम किया है? स्थानीय पार्षद और पूर्व ज़ोन चेयरमैन योगेश वर्मा का ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा अब वज़ीरपुर के गलियारों में जोक (Joke) बन चुका है। खबर दिखाए जाने के एक महीने बाद भी पार्षद साहब की चुप्पी चीख-चीख कर कह रही है कि सत्ता के गलियारों में सब कुछ ठीक नहीं है। क्या जनप्रतिनिधि अब जनता के हितों के बजाय बिल्डर के हितों के ‘चौकीदार’ बन गए हैं?

बिल्डर का ‘मैनेजर’ बने डीसी साहब !

कोर्ट ने ‘प्राकृतिक न्याय’ के नाम पर बिल्डर को सुनने का आदेश दिया था, लेकिन डीसी साहब ने इसे ‘कार्रवाई टालने का लाइसेंस’ समझ लिया। बिल्डर सचिन जैन को बार-बार नोटिस दिए गए, वह नहीं आया। सामान्य प्रक्रिया में, यदि नोटिस के बाद कोई पेश न हो तो तुरंत कार्रवाई होती है, लेकिन यहाँ डीसी साहब किसी ‘शाही फरमान’ का इंतज़ार कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि डीसी खुद बिल्डर को गाइड कर रहे हैं कि कानून की पेचीदगियों का फायदा उठाकर कार्रवाई को कैसे ठंडे बस्ते में डाला जाए। जब भी दिल्ली दर्पण टीवी की टीम डीसी संदीप कुमार या अधिशासी अभियंता ललित से सवाल पूछने पहुँचती है, ये अधिकारी किसी भगोड़े की तरह दफ्तर से नदारद मिलते हैं। फोन न उठाना और दफ्तर से गायब रहना साफ़ दर्शाता है कि इनके पास अपनी ‘गुलामियत’ को सही ठहराने के लिए कोई शब्द नहीं बचे हैं। वज़ीरपुर में सील फैक्ट्रियों और बैंक्वेट हॉलों का धड़ल्ले से चलना बता रहा है कि MCD किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रही है। क्या प्रशासन तब जागेगा जब यहाँ भी कोई बड़ी इमारत गिरेगी या आग लगेगी? या फिर अधिकारियों ने यह मान लिया है कि 1 करोड़ की रिश्वत के आगे इंसानी जान की कोई कीमत नहीं है ?

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CAIT की बड़ी पहल: वैश्विक व्यापार समझौतों और बजट का लाभ दिलाने के लिए देशभर में होगी ‘मैन्युफैक्चरर्स कॉन्फ्रेंस’

नई दिल्ली: केंद्रीय बजट और भारत-अमेरिका के बीच हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते के बाद अब कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने भारतीय व्यापारियों और एमएसएमई (MSME) को सशक्त बनाने के लिए कमर कस ली है। कैट ने देशभर में “मैन्युफैक्चरर्स कॉन्फ्रेंस” आयोजित करने का निर्णय लिया है, ताकि छोटे और मध्यम उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नए अवसरों की जानकारी दी जा सके।


क्यों खास है यह कॉन्फ्रेंस?
इस पहल की घोषणा करते हुए कैट के राष्ट्रीय महामंत्री एवं सांसद श्री प्रवीन खंडेलवाल ने बताया कि इन सम्मेलनों का मुख्य उद्देश्य व्यापारियों को हाल ही में हुए मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) और केंद्रीय बजट के बारीक प्रावधानों से अवगत कराना है।
इन प्रमुख समझौतों पर होगी चर्चा:

  • भारत–अमेरिका व्यापार समझौता
  • भारत–यूएई व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA)
  • भारत–ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौता (ECTA)
  • भारत–EFTA और प्रस्तावित भारत–यूरोपीय संघ (EU) समझौता
    व्यापारियों को क्या मिलेगा लाभ?
    श्री खंडेलवाल के अनुसार, मैन्युफैक्चरर्स कॉन्फ्रेंस में केवल चर्चा ही नहीं होगी, बल्कि व्यापारियों को उन तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी जाएगी जो उनके बिजनेस को ग्लोबल बनाने में मदद करेंगे:
  1. निर्यात और निवेश: नए बाजारों तक पहुँचने के तरीके।
  2. टैरिफ लाभ: निर्यात पर लगने वाले शुल्कों में छूट की जानकारी।
  3. लॉजिस्टिक्स और अनुपालन: व्यापार करने की प्रक्रिया को सरल बनाना।
  4. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: विदेशी तकनीक का लाभ उठाकर उत्पादन बढ़ाना।

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ग्रीन बेल्ट बनी ‘नेताओं का तबेला’: शिकायतों पर कुंडली मार कर बैठा प्रशासन, क्या दूध-घी के चढ़ावे में बिक गए नियम ?

– दिल्ली दर्पण ब्यूरो 

नई दिल्ली कहते हैं ‘चिराग तले अंधेरा’ होता है, लेकिन केशव पुरम जोन में तो चिराग के नीचे ही पूरा ‘तबेला’ बसा दिया गया है। जिस एमसीडी दफ्तर से पूरे इलाके के अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर डंडा चलता है, उसी दफ्तर की चारदीवारी के भीतर अधिकारियों की नाक के नीचे सरकारी ‘ग्रीन बेल्ट’ को नेताओं की निजी डेयरी में तब्दील कर दिया गया है। ताज्जुब की बात यह है कि जहाँ निगम के बड़े अधिकारियों के नाम और पद की पट्टियाँ शान से लगी हैं, ठीक उसी के नीचे गायें जुगाली कर रही हैं और सरकारी जमीन पर गोबर के ढेर लगे हैं।

तस्वीरों और जीपीएस डेटा (Block C1) ने इस काली करतूत की पोल खोल दी है, जिससे साफ है कि यह कब्जा कोई रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि अधिकारियों की ‘मूक सहमति’ से सालों से फल-फूल रहा है। शिकायतकर्ता रमेश कर्दम का आरोप सीधा और तीखा है—यह डेयरी किसी आम आदमी की नहीं, बल्कि एक रसूखदार बीजेपी नेता की है। शायद यही वजह है कि जब साधारण जनता के मकानों पर निगम का बुलडोजर गरजता है, तो इस अवैध डेयरी के पास आकर उसका पेट्रोल खत्म हो जाता है। चर्चा तो यहाँ तक है कि इस डेयरी का ‘शुद्ध दूध और घी’ सीधे साहबों की रसोई तक पहुँच रहा है, जिसके बदले में सारे नियम-कानूनों को ताक पर रख दिया गया है।

हैरानी की बात यह है कि ग्रीन बेल्ट की इस जमीन पर न सिर्फ पशु बंधे हैं, बल्कि मजदूरों के रहने के लिए पक्के कमरे तक बना लिए गए हैं। रमेश कर्दम ने उपराज्यपाल से लेकर मेयर और आयुक्त तक को सबूतों के साथ चिट्ठियां लिखी, लेकिन लगता है कि पूरा सिस्टम इस फाइल पर कुंडली मारकर बैठा है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और सरकारी जमीन ‘नेताओं की जागीर’ बन जाए, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? क्या निगम के आला अफसर इस ‘दूधिया रसूख’ के आगे घुटने टेक चुके हैं या फिर किसी बड़े एक्शन का इंतज़ार है ?

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