नई दिल्ली: दिल्ली के हौज खास स्थित एएन झा डियर पार्क से हिरणों को राजस्थान के टाइगर रिजर्व में स्थानांतरित (Translocate) करने का मुद्दा अब एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है। 19 अप्रैल की सुबह डियर पार्क के गेट पर जुटे सैकड़ों प्रकृति प्रेमियों, पर्यावरण विशेषज्ञों और छात्रों ने वन विभाग और डीडीए (DDA) की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया है। विरोध प्रदर्शन के दौरान सवाल उठा कि क्या ये मासूम चीतल हिरण बाघों के बीच जिंदा बच पाएंगे, या उन्हें सीधे ‘मौत के मुंह’ में धकेला जा रहा है?
सर्वे में डरावना खुलासा: कहाँ गए बाकी हिरण?
कोर्ट के निर्देश पर हुए एक सर्वे ने वन विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। चौंकाने वाले आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में कुल 261 हिरणों को जंगल में भेजा गया था, लेकिन इनमें से मात्र 17 हिरण ही जीवित मिले हैं। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि कई हिरणों की हड्डियां मिलीं और कुछ के पैरों में आज भी रस्सियां बंधी हुई हैं, जो सीधे तौर पर ट्रांसलोकेशन के दौरान बरती गई भीषण लापरवाही को दर्शाती है। इतना ही नहीं, एक पिंजरे में सड़ता हुआ मोर मिलना विभाग की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।
“टाइगर रिजर्व भेजना यानी मौत को न्योता”
विशेषज्ञों का कहना है कि चीतल हिरण स्वभाव से बेहद शर्मीले और डरपोक होते हैं। उन्हें रणथंभौर या मुकुंदरा जैसे इलाकों में छोड़ना, जहाँ बाघ और चीते जैसे शिकारी पहले से मौजूद हैं, उनके लिए आत्मघाती है। प्रदर्शनकारियों ने याद दिलाया कि राजस्थान के जिन जंगलों में कभी हिरणों के झुंड हुआ करते थे, वहां अब शिकारियों की संख्या बढ़ने के कारण अन्य जानवरों का अस्तित्व संकट में है।
डीडीए की व्यावसायिक भूख और हिरणों का घर
डियर पार्क के पर्यावरण को बचाने के लिए लड़ रहे संगठनों ने एक और गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि 335 एकड़ की अरावली वन भूमि में से डीडीए ने मात्र 10 एकड़ ही हिरणों के लिए छोड़ा है। बाकी जमीन का इस्तेमाल रिसॉर्ट, बारात घर और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। प्राकृतिक आवास सिमटने से हिरण पहले से ही पानी और भोजन की कमी से जूझ रहे थे, और अब उन्हें ‘ट्रांसलोकेशन’ के नाम पर ठिकाने लगाया जा रहा है।
आईयूसीएन (IUCN) गाइडलाइंस की अनदेखी
विरोध कर रहे संगठनों का स्पष्ट आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइंस का खुलेआम उल्लंघन हुआ है। गर्भवती, बीमार और सींग वाले हिरणों को भी जबरन ट्रकों में लादकर 14 घंटे की लंबी यात्रा पर भेज दिया गया। बिना किसी टैगिंग, बिना ट्रेनिंग और बिना अनुकूलन (Acclimatization) के किए गए इस स्थानांतरण का हश्र वही हुआ, जिसका डर था।
प्रकृति प्रेमियों की दो टूक: “पहले सुधार, फिर फैसला”
प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन के सामने तीन मुख्य मांगे रखी हैं:
- जब तक पारदर्शी ऑडिट नहीं होता, तब तक हिरणों के ट्रांसलोकेशन पर तत्काल रोक लगाई जाए।
- हिरणों की संख्या, देखभाल और भोजन को लेकर सरकार पूरी पारदर्शिता बरते।
- व्यावसायिक उपयोग में ली गई हिरणों की जमीन को वापस उनके आवास के लिए बहाल किया जाए।
दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और टेरी के छात्र-शिक्षकों के साथ मिलकर अब यह अभियान तेज हो गया है। मांग साफ है—समस्या हिरणों को हटाने में नहीं, बल्कि डियर पार्क के बेहतर प्रबंधन में है।

