सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों से निकलने वाली बायोगैस बेचेगा दिल्ली जल बोर्ड, निजी कंपनियों से मांगे प्रस्ताव
दिल्ली जल बोर्ड ने केशोपुर और यमुना विहार एसटीपी से निकलने वाली कच्ची बायोगैस के व्यावसायिक उपयोग के लिए रुचि पत्र आमंत्रित किए हैं।

दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) अपने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों (एसटीपी) में कीचड़ के उपचार से पैदा होने वाली बायोगैस का व्यावसायिक इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है। जल बोर्ड इसके लिए निजी कंपनियों को जोड़ने जा रहा है, जो संयंत्रों से कच्ची बायोगैस खरीदेंगी। इस पहल का मुख्य उद्देश्य गैस को यूं ही जलाने या व्यर्थ छोड़ने के बजाय उसका बिजली उत्पादन और वाहनों के ईंधन के रूप में उपयोग करना है।
वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, शुरुआत में राजधानी के 37 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों में से दो संयंत्रों में यह प्रक्रिया शुरू की जा रही है। इसके लिए जल बोर्ड ने निजी कंपनियों से रुचि पत्र (ईओआई) आमंत्रित किए हैं। एक अधिकारी ने बताया कि कंपनियों के चयन की प्रक्रिया नवंबर तक पूरी होने की उम्मीद है।
इस योजना के तहत केशोपुर फेज-1 और यमुना विहार फेज-2 एसटीपी को चुना गया है। केशोपुर संयंत्र की क्षमता को 12 मिलियन गैलन प्रतिदिन (एमजीडी) से बढ़ाकर 18 एमजीडी किया जा रहा है। वहीं, यमुना विहार फेज-2 संयंत्र की वर्तमान क्षमता 15 एमजीडी (लगभग 6.8 करोड़ लीटर प्रतिदिन) है।
राजधानी दिल्ली में रोजाना करीब 1,000 एमजीडी सीवेज उत्पन्न होता है, जबकि शहर की कुल सीवेज उपचार क्षमता 814 एमजीडी है। जल बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार निजी खरीदार सीधे संयंत्रों से अशोधित बायोगैस खरीदेंगे। इसके बाद वे गैस के शुद्धिकरण, संपीड़न, बॉटलिंग और बायो-सीएनजी बनाने या बिजली पैदा करने के लिए अपनी इकाइयां खुद स्थापित करेंगे।
इस व्यवस्था के तहत जल बोर्ड तय डिलीवरी पॉइंट पर कच्ची बायोगैस की आपूर्ति करेगा और एसटीपी परिसर में पट्टे या लाइसेंस के आधार पर जमीन उपलब्ध कराएगा। हालांकि, संयंत्र के डिजाइन, स्थापना, संचालन और रखरखाव का पूरा खर्च संबंधित कंपनियों को ही उठाना होगा। इसके साथ ही सभी जरूरी वैधानिक मंजूरियां हासिल करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होगी।
वर्तमान में जल बोर्ड कुछ संयंत्रों में बनने वाली बायोगैस का इस्तेमाल आंतरिक कार्यों और कैप्टिव बिजली उत्पादन के लिए करता है। इसके विपरीत, केशोपुर फेज-1 और यमुना विहार फेज-2 में फिलहाल बायोगैस को जलाकर नष्ट किया जाता है। आंकड़ों के अनुसार, यमुना विहार फेज-2 से हर महीने करीब 18,173 क्यूबिक मीटर बायोगैस निकलती है।
केशोपुर संयंत्र का डिजाइन प्रति घंटे 257.26 क्यूबिक मीटर बायोगैस उत्पादन की क्षमता रखता है। इस संयंत्र के 18 एमजीडी में अपग्रेड होने के बाद यहां से रोजाना 10,436 से 13,045 क्यूबिक मीटर तक गैस मिलने का अनुमान है। अधिकारियों का कहना है कि कंपनियों से मिलने वाले सुझावों और बाजार की रुचि के आधार पर विस्तृत निविदा (आरएफपी) जारी की जाएगी और बाद में इसे अन्य एसटीपी में भी लागू किया जा सकता है।
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